सतीश जैन,इंदौर, 04 अप्रैल 2025 । सुविख्यात जैन मनीषी श्री आत्मानंद सागर (पूर्व नाम पंडित रतनलाल शास्त्री) का बुधवार, 2 अप्रैल की रात्रि 11:15 बजे संलेखना पूर्वक समाधि मरण हो गया। वे पिछले 58 दिनों से आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के निर्देशन में संलेखना साधना में लीन थे। गुरुवार को मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज भी ससंघ इंदौर पधारे।
पंडित शास्त्री जी ने शताधिक आचार्यों और साधु-संतों को शिक्षा दी। वे ज्ञान के महासागर माने जाते थे। उनके पुण्य प्रभाव से कई साधु-संत उनके अंतिम क्षणों में सानिध्य देने पहुंचे। समाधि से पूर्व मुनि श्री निर्णय सागर जी एवं महिमा सागर जी महाराज भी उपस्थित रहे।
गुरुवार सुबह 8:00 बजे उनकी अंतिम महायात्रा समवशरण मंदिर से निकली, जो महावीर कीर्ति स्तंभ, किशनपुरा होते हुए गोमटगिरि पहुंची। श्रद्धालुओं ने मार्ग में डोले के दर्शन कर श्रद्धा अर्पित की। समाज के अध्यक्ष राजकुमार पाटोदी व अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में अंतिम क्रियाएं संपन्न हुईं। बड़ी संख्या में समाजजन एवं श्रद्धालु इस अवसर पर उपस्थित रहे।
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क्या है सल्लेखना समाधि मरण?
डॉ जैनेंद्र जैन
जैन शास्त्रों में सल्लेखना पूर्वक होने वाली मृत्यु को समाधि मरण, पंडित मरण, अथवा संथारा भी कहा जाता है जिसका अर्थ जीवन के अंतिम समय में तप विशेष की आराधना है जिसके आधार पर साधक मृत्यु की समीपता मानकर चारों प्रकार के आहार और क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय एवं अपने परी के प्रति मोह ममत्व का त्याग कर निराकुल भाव से परमात्मा का चिंतन करते हुए मृत्यु का वरण करता है। सल्लेखना समाधि पूर्वक मृत्यु का वरण करना
ही मृत्यु महोत्सव है।
सल्लेखना व्रत अंगीकार करने वाले के जीवन में लोकेषणा और सुखेषणा की लालसा खत्म हो जाती है और वह अपनी आत्मिक शक्ति को पहचान कर प्रभु परमात्मा के चिंतन में अनवरत लीन रहते हुए एवं आध्यात्मिक विकास की साधना करते हुए निराकुल भाव से अपने मरण को मांगलिक बना लेता है