बाल संरक्षण आयोग ने दिए जांच के आदेश

आखिर छात्रों को मीम्स बनाकर क्यों जाहिर करनी पड़ी अपनी वेदना ?

क्या स्कूल में छात्रों के साथ हो रहा था दुर्व्यवहार ?

इंदौर वार्ता / newo2 शहर के सुखलिया स्थित ICSE/ISC बोर्ड से मान्यता प्राप्त एक अंग्रेजी माध्यम के लिटिल वंडर स्कूल के खिलाफ गंभीर मामला सामने आया है। दरअसल स्कूल ने तीन नाबालिग छात्रों को स्कूल से निष्कासित कर दिया। कारण—उन्होंने कथित रूप से शिक्षकों के मीम्स बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किए थे। इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग ने इसे गंभीर मामला मानते हुए इंदौर कलेक्टर को सात दिनों के भीतर जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले ने जुवानाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों का मखौल उडाने के रवैया को भी उजागर किया। सवाल है कि वार्षिक परीक्षा से ठीक पहले स्कूल के द्वारा इस तरह की कठोरतम कार्यवाही का छात्र के मानसिक स्वास्थ्य पर पढ़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव का जिम्मेदार कौन?

शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन

मामले में प्रारंभिक तौर पर साफ है कि स्कूल ने किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) की धारा 24 और 75 तथा शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून का उल्लंघन किया है। विशेषज्ञ की माने तो स्कूल का यह कदम छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है और यह बच्चों के अधिकारों के खिलाफ है।

क्या है पूरा मामला?

लिटिल वंडर स्कूल में 14-15 वर्षीय तीन छात्रों ने कथित रूप से स्कूल प्रशासन की प्रताड़ना से तंग आकर शिक्षकों के मीम्स बनाए और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। इनमें आपत्तिजनक भाषा के प्रयोग की भी बात सामने आई है। इस पर स्कूल प्रबंधन ने बिना कोई सुनवाई किए तीनों छात्रों को निष्कासित कर दिया।

स्कूल प्रबंधन के सामने गिड़गिड़ाते अभिभावक

पीड़ित छात्रों के अभिभावकों ने स्कूल प्रशासन से कई बार अनुरोध किया, लेकिन प्रबंधन ने केवल उन्हें आगामी परीक्षा में बैठने की अनुमति दी, परंतु स्कूल में प्रवेश से पूरी तरह वंचित कर दिया। और साफ कर दिया कि छात्रों को आगामी शिक्षा सत्र में भी भाग लेने नहीं दिया जाएगा। इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और उनका भविष्य भी संकट में आ गया है।

बड़ा सवाल—आखिर क्यों बनाए गए मीम्स?

  • क्या स्कूल में छात्रों को प्रताड़ित किया जाता था?
  • क्या स्कूल प्रबंधन बच्चों की भावनाओं को समझने में असफल रहा?
  • क्या स्कूल ने इस बात पर विचार किया कि आखिर बच्चों ने शिक्षकों के मीम्स क्यों बनाए?
  • · जब स्कूल के अन्य छात्रों ने भी यह मीम्स साझा किए, तो क्या सभी छात्रों को मिलेगा दंड?
  • परीक्षा के पहले बच्चों के निष्कासन से उनका भविष्य क्या अंधकारमय नहीं हो गया?
  • क्या स्कूल को कठोर सजा देने के बजाय बच्चों में सकारात्मक बदलाव लाने पर विचार नहीं करना चाहिए?

घटनाक्रम

4 फरवरी 2025: स्कूल ने कथित तौर पर छात्रों को टर्मिनेट कर दिया और उनके लिए कक्षाओं में प्रवेश पर रोक लगा दी ।

17 फरवरी 2025: अभिभावकों को बुलाकर एकपक्षीय निर्णय सुनाया गया कि छात्रों को सिर्फ 9वीं की वार्षिक परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन वे आगे स्कूल में प्रवेश नहीं ले सकेंगे।

9 मार्च 2025: एक अभिभावक ने इस मामले को मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया।

18 मार्च 2025: आयोग ने इंदौर कलेक्टर को जांच के निर्देश दिये। जबकि आगामी अप्रैल में छात्रों की परीक्षाएँ संभावित हैं।

अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल ने मनमाने ढंग से उनके बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया।

स्कूल की डायरेक्टर डॉ नियति चेलावत ने दावा किया कि निष्कासन के दायरे में आए बच्चों को और उनके पैरेंट्स को एक साल से वार्निंग दे रहे थे। पैरेंट्स को बच्चों के बदलते व्यवहार के बारे में भी अवगत करा रहे थे लेकिन इस बार जो गलती बच्चों ने की है वह स्कूल की छवि के लिए नुकसानदायक है। अन्य छात्र भी बिगड़ रहे हैं इसलिए यह कार्यवाही की गई है। लेकिन जब डॉ चेलावत से पूछा गया कि बच्चे एक साल से किस तरह की शैतानियां कर रहे थे, और अपने किस तरह की बिहेवियर थेरेपी दी जिसका वे जवाब नहीं दे सकीं।

बाल संरक्षण आयोग की सख्ती

मप्र बाल संरक्षण आयोग ने इसे बच्चों के शैक्षिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते संज्ञान लिया है। आयोग ने इंदौर कलेक्टर को निर्देश दिया है कि वे इस पर 7 दिन में विस्तृत जांच कर कार्रवाई करें।

मनोवैज्ञानिकों की राय: छात्रों पर गंभीर प्रभाव

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अचानक निष्कासन से छात्रों में आत्मविश्वास की कमी, तनाव और असुरक्षा बढ़ सकती है। 14 वर्षीय छात्र के आत्म-सम्मान और शिक्षा पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

यह adolescent एडोलसेंट एज से जुड़ा है। इस उम्र में बच्चे इमोशनली मेच्योर नहीं होते हैं और न ही उन्हें सही और गलत की इतनी समझ होती है। इस उम्र में बच्चे क्रिटिकली एनालाइज नहीं कर पाते हैं। बच्चे इस तरह के कृत्य फन के लिए करते हैं। किसी को हर्ट करना उनका उद्देश्य नहीं होता। आज की डिजिटल दुनिया में उन्हें लगता है कि उन्हें सब पता है। वे पकड़े नहीं जायेंगे। वे सोच भी नहीं पाते कि क्या बुरा है। इसलिए वे ऑथोरिटी के सामने सबमिसिव (झुकते नहीं) भी नहीं होते।जब डिजिटल वर्ल्ड नहीं था बच्चे तब भी टीचर्स का मजाक ब्लैक बोर्ड या अन्य माध्यमों से उड़ाते थे। स्कूल ने बच्चों को कठोरतम दंड देकर स्कूल से निकाल कर बहुत गलत किया है। इससे बाल मन पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। ये टीनएज बच्चे सकारात्मक बदलाव के बजाय डिस्ट्रिक्टव होंगे। आत्महत्या जैसे विचार भी पनप सकते हैं। स्कूल प्रबंधन को स्कूल से निष्कासित करने के बजाय उन्हें काउंसलिंग सेशन देना चाहिए। साइकोलॉजिस्ट से सेशन थेरेपी दिलवाना चाहिए।

– डॉ राम गुलाम राजदान, वरिष्ठ मनोचिकित्सक

क्या कह रहे हैं पालक संघ के विशेषज्ञ?

“स्कूल को निष्पक्ष जांच करनी चाहिए थी। छात्रों को सफाई का अवसर दिए बिना निष्कासन असंवैधानिक है। बच्चों को शिक्षा से वंचित करना मानसिक प्रताड़ना की श्रेणी में आता है। JJ एक्ट के अनुसार किसी भी परिस्थिति में छात्रों पर इस तरह की कार्यवाही अवैधनिक है। यदि मामला अदालत जाता है, तो स्कूल प्रशासन के खिलाफ गंभीर दंडात्मक कार्रवाई संभव है।”

-एडवोकेट चंचल गुप्ता, अध्यक्ष
जागृत पालक संघ, मध्य प्रदेश

जे जे एक्ट और RTE कानून के उल्लंघन के आरोप

  • धारा 24: बच्चों को हानिकारक माहौल से बचाने और उन्हें सुरक्षित वातावरण देने की जिम्मेदारी तय करती है।
  • धारा 75: बच्चों के प्रति किसी भी प्रकार की मानसिक या शारीरिक क्रूरता को दंडनीय अपराध मानती है।
  • RTE अधिनियम, 2009: सभी बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार देता है, और किसी भी कारण से उन्हें स्कूल से निकाला नहीं जा सकता।
  • कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल प्रबंधन ने बिना उचित प्रक्रिया के छात्रों को टर्मिनेट कर दिया, जो इन धाराओं के तहत अपराध हो सकता है।

संभावित कार्रवाई

  • JJ Act के तहत स्कूल प्रबंधन पर कानूनी कार्रवाई और जुर्माना संभव।
  • ICSE बोर्ड द्वारा स्कूल की मान्यता की समीक्षा की जा सकती है।
  • छात्रों को पुनः प्रवेश का आदेश दिया जा सकता है।
  • स्कूल प्रशासन की प्रतिक्रिया

FIR और अगली कार्रवाई

अभिभावकों ने संकेत दिए हैं कि वे स्कूल प्रबंधन के खिलाफ FIR दर्ज कराने की तैयारी में हैं। कानूनी जानकारों के मुताबिक, अगर धारा 75 के तहत आरोप साबित होते हैं, तो दोषियों को 3-5 साल की सजा और भारी जुर्माना हो सकता है।

अभिभावकों की मांग

  • छात्रों को स्कूल में पुनः प्रवेश दिया जाए।
  • स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई हो।
  • भविष्य में किसी अन्य छात्र के साथ इस प्रकार की कार्रवाई न हो।

यह मामला केवल तीन छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों की जवाबदेही और बच्चों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा एक अहम मुद्दा बन चुका है। आयोग की जांच रिपोर्ट और प्रशासन की कार्रवाई पर अब सबकी नजरें टिकी हैं।

https://www.bhaskar.com/local/mp/indore/news/indore-little-wonder-school-child-commission-took-cognizance-134664832.html

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By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित दैनिक पीपुल्स समाचार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।