74 साल में पहली बार, मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री संघ मुख्यालय में दी श्रद्धांजलि
भारत के इतिहास में पहली बार, एक कार्यरत प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुख्यालय का दौरा किया। नरेंद्र मोदी, जिन्होंने 2014 और 2024 के अपने दो कार्यकालों में संघ मुख्यालय जाने से परहेज किया था, अब 2025 में नागपुर पहुंचे और स्मृति मंदिर में श्रद्धांजलि अर्पित की। सवाल यह उठता है कि आखिर 10 साल की दूरी के बाद ऐसा क्या बदल गया?
मोदी और संघ: 10 साल की दूरी क्यों और अब अचानक नजदीकी?
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा संघ से जुड़ी रही है, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने खुद को स्वतंत्र नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। 2014 और 2024 के चुनावों में उनकी छवि एक ग्लोबल लीडर के रूप में उभरी, जहां संघ की छाया से दूरी बनाए रखना उनकी रणनीति का हिस्सा था।
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया और गठबंधन सरकार बनी। राजनीतिक समीकरण बदले, और मोदी को अब एक मजबूत समर्थन प्रणाली की आवश्यकता है। ऐसे में संघ के साथ संबंधों को पुनः स्थापित करना अनिवार्य हो गया।
जेपी नड्डा का बयान – संबंधों में दरार
BJP अध्यक्ष जेपी नड्डा ने 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि “अब बीजेपी सक्षम है और उसे आरएसएस की जरूरत नहीं है।” यह बयान तब आया जब मोदी सरकार ‘400 पार’ के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरी थी। लेकिन नतीजों में बीजेपी 240 सीटों पर सिमट गई और गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर हो गई।
यही कारण है कि चुनाव के बाद संघ की भूमिका पर चर्चाएं तेज हो गईं। बीजेपी की हार के लिए संघ की निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहराया गया, और अब मोदी के संघ मुख्यालय दौरे को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष की गुत्थी: शक्ति संतुलन
बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त हुए एक साल से अधिक हो गया है, लेकिन अब तक नया अध्यक्ष नियुक्त नहीं हुआ। सवाल यह है कि क्या यह मोदी-शाह और संघ के बीच की खींचतान का परिणाम है?
अगर संघ की मर्जी से अध्यक्ष चुना जाता है, तो मोदी-शाह की पकड़ पार्टी पर कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, अगर मोदी-शाह अपने पसंदीदा उम्मीदवार को अध्यक्ष बनाते हैं, तो संघ की भूमिका सीमित हो सकती है।
योगी आदित्यनाथ का भविष्य:
योगी आदित्यनाथ को लेकर भी बीजेपी और संघ में मतभेद की अटकलें हैं। केंद्रीय नेतृत्व उन्हें हटाना चाहता है, लेकिन संघ अब तक उनके समर्थन में खड़ा रहा है। सवाल यह है कि क्या मोदी और शाह, आरएसएस को मनाकर योगी को हटाने में सफल होंगे?
आरएसएस की 100वीं वर्षगांठ और उसकी भविष्य की भूमिका
2025 में आरएसएस अपनी स्थापना के 100 साल पूरे करेगा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या संघ केवल बीजेपी की चुनावी मशीनरी बनकर रह जाएगा, या फिर देश के ज्वलंत मुद्दों—बेरोजगारी, महंगाई, चीन नीति, सांप्रदायिक सौहार्द—पर भी कोई ठोस बयान देगा?
संघ के रिश्तों में नया अध्याय
मोदी के संघ मुख्यालय दौरे को बीजेपी और आरएसएस के बीच नई राजनीतिक समरसता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह दौरा न केवल पार्टी नेतृत्व के नए समीकरण को दर्शाता है, बल्कि 2029 के चुनावों के लिए रणनीतिक बदलाव का संकेत भी देता है।
क्या आरएसएस और बीजेपी के बीच यह नया समीकरण स्थायी रहेगा? या फिर 2029 के चुनावों के करीब आते-आते ये संबंध फिर से बदल जाएंगे?
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