सुनीता विलियम्स के घर वापसी की तैयारियाँ जोरों पर हैं। लेकिन ठहरिए—घर? ये सवाल हममें से ज्यादातर के मन में नहीं उठता, क्योंकि हमारी जड़ें गुरुत्वाकर्षण से बँधी हैं। लेकिन सुनीता—जो अब तक 600 से ज्यादा दिन अंतरिक्ष में बिता चुकी हैं—के लिए यह सवाल हर वक्त की गूँज रहा होगा।

टेक्सस, ह्यूस्टन में उनका घर है। उनके पति वहाँ उनका इंतजार कर रहे हैं। बच्चे नहीं हैं, लेकिन पालतू जानवरों से गहरा लगाव है। कभी उन्होंने अहमदाबाद की एक लड़की को गोद लेने की इच्छा भी जताई थी। लेकिन अंतरिक्ष की उस अथाह वीरानी में, जहाँ पृथ्वी के नियम, रिश्ते, संस्कार—सब धुँधले पड़ जाते हैं—क्या वे कभी सोचती होंगी कि असल में उनका घर है कहाँ? इस पूरी सृष्टि में क्या किसी आत्मा का कोई स्थायी ठिकाना भी है?

अभी के लिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन ही उनका ठिकाना बना हुआ है। वे वहाँ तीन बार जा चुकी हैं। पिछली बार जब 5 जून को उन्होंने पृथ्वी की हवा, धूप और गुरुत्वाकर्षण को अलविदा कहा, तो महज़ 9 दिनों की मेहमान थीं। लेकिन किस्मत के फेर में यह प्रवास 9 महीनों से लंबा खिंच गया। अब उन्हें “स्ट्रैंडेड-एस्ट्रोनॉट” कहा जाने लगा है—यानी अंतरिक्ष की बंजारा मुसाफ़िर!

जो इंसान 9 दिन के लिए घर से निकला हो, यह सोचकर कि जल्द लौटेगा, और फिर महीनों तक न लौट सके—ना सिर्फ अपने शहर, अपने देश, बल्कि पूरी पृथ्वी से ही दूर—उसकी मनोदशा कैसी होगी? क्या उसे घर की याद आती होगी? लेकिन पहले यह तय तो हो कि घर आखिर कहाँ है?

आईएसएस से सुनीता ने कई वीडियो भेजे। उनकी जिज्ञासा और उमंग देखते ही बनती है। वे अपने दर्शकों को ज़ीरो-ग्रैविटी में ब्रश करने के तरीके बताती हैं, पानी के बुलबुले को हवा में तैरते देखती हैं, व्यायाम करती हैं, खाने-पीने के गुर सिखाती हैं। कभी-कभी कपोला विंडो में बैठकर पृथ्वी को निहारती हैं—नीली, विशाल, घूमती हुई। क्या तब उनके मन में अपने घर की भूख उठती होगी?

लेकिन क्या वे पृथ्वी को अपना घर मानती भी हैं? या वे खुद को ब्रह्मांड की नागरिक—कॉस्मोपोलिटन नहीं, बल्कि कॉसमॉस-पोलिटन समझने लगी हैं?

अनासक्ति, वैराग्य, और स्थितप्रज्ञता के बिना यह संभव नहीं। अगर वे अपने घर को याद करके दुखी होतीं, तो अंतरिक्ष से पहले अवसाद उन्हें निगल लेता। वैसे भी, मनुष्य किसी जगह या रिश्ते से तभी तक बँधा रहता है, जब तक उसमें ममत्व होता है। एक बार वह छूटा, तो फिर मनुष्य से बड़ा कोई निर्मोही नहीं।

अब, 900 घंटे की रिसर्च और 62 घंटे की स्पेसवॉक के बाद, सुनीता धरती पर लौट रही हैं। लेकिन क्या वे घर लौट रही हैं?

जिसके मन में यह सवाल एक बार जाग जाए, वह गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो जाता है। फिर वह चेतना की तरह, स्मृति और कल्पना की तरह, निर्वात में तैरने लगता है—सुनीता की कृश देह की तरह, पार्थिव से परे, एक मुक्त आत्मा की तरह!

By Jitendra Singh Yadav

जितेंद्र सिंह यादव वरिष्ठ पत्रकार | आरटीआई कार्यकर्ता | राजनीतिक विश्लेषक 15+ वर्षों का पत्रकारिता अनुभव, UNI से जुड़े। Save Journalism Foundation व इंदौर वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के संस्थापक। Indore Varta और NewsO2.com से जुड़े। निष्पक्ष पत्रकारिता व सामाजिक सरोकारों के लिए समर्पित।