नई दिल्ली। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2025 में भारत 180 देशों में 159वें स्थान पर पहुंच गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की मीडिया स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में पत्रकारों पर बढ़ते हमले, सरकारी दबाव, कॉरपोरेट नियंत्रण, डिजिटल सेंसरशिप और दमनात्मक कानूनों का इस्तेमाल प्रेस की स्वतंत्रता को लगातार कमजोर कर रहा है।

सूचकांक में शीर्ष पांच देश नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन, नीदरलैंड और फिनलैंड मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं, पत्रकार सुरक्षा और संपादकीय स्वतंत्रता के कारण अग्रणी हैं। इसके विपरीत भारत में आलोचनात्मक पत्रकारिता अक्सर मुकदमों, छापों, गिरफ्तारी और विज्ञापन आधारित दबाव का सामना करती है।

भारत के पड़ोसी देशों से तुलना भी चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। नेपाल भारत से बेहतर स्थिति में है, जबकि भूटान और श्रीलंका भी कई मामलों में अधिक सुरक्षित मीडिया वातावरण प्रदान करते हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी चुनौतियां हैं, लेकिन भारत का लगातार निचला स्थान यह संकेत देता है कि लोकतांत्रिक ढांचे के बावजूद प्रेस स्वतंत्रता अपेक्षित स्तर पर नहीं है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में मीडिया स्वामित्व का बढ़ता केंद्रीकरण, सत्ता समर्थक नैरेटिव और स्वतंत्र पत्रकारों पर कार्रवाई लोकतंत्र की बुनियादी भावना को प्रभावित कर रही है। डिजिटल मीडिया पर आईटी नियमों और जांच एजेंसियों के दबाव ने स्थिति को और गंभीर बनाया है।

आलोचकों का कहना है कि यदि भारत को वास्तविक लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में अपनी वैश्विक साख बनाए रखनी है तो पत्रकार सुरक्षा, कानूनी सुधार और मीडिया स्वायत्तता सुनिश्चित करनी होगी। अन्यथा “लोकतंत्र” का दावा केवल राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।

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