डेंटल स्टूडेंट्स बने पेशेंट्स सप्लायर

इंदौर, 23 फरवरी 2026: शहर के एक निजी डेंटल कॉलेज में बीडीएस फाइनल ईयर की परीक्षाओं के बीच एक गंभीर विवाद सामने आया है। छात्रों का आरोप है कि कॉलेज के डीन द्वारा व्हाट्सएप ग्रुप पर संदेश भिजवा कर स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वे स्वयं मरीज लेकर आएं, अन्यथा परीक्षा में असफल कर दिए जाएंगे। हालांकि कॉलेज प्रशासन ने इन आरोपों से साफ इंकार किया है।

लाखों की फीस, फिर भी मरीज खुद ढूंढो?

देश में मेडिकल और डेंटल शिक्षा की फीस लाखों रुपये में होती है। छात्र और उनके परिवार भारी आर्थिक निवेश के साथ इन संस्थानों में प्रवेश लेते हैं। बदले में संस्थान से अपेक्षा होती है कि वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्याप्त क्लीनिकल एक्सपोजर उपलब्ध कराए।

छात्रों का कहना है कि यदि कॉलेज के ओपीडी में पर्याप्त मरीज नहीं हैं, तो मान्यता किस आधार पर दी गई? यह सवाल सीधे नियामक संस्थाओं पर भी खड़ा होता है।

छात्र बने “मरीज सप्लायर”

छात्रों के अनुसार संदेश में विशेष रूप से ऐसे मरीज लाने को कहा गया जिनमें “मॉडरेट टू एडवांस्ड कैरीज” यानी दांतों में गंभीर सड़न हो। इस निर्देश ने छात्रों की मानसिक स्थिति पर भी असर डाला है।

पहले से परीक्षा के दबाव में छात्र

परिचितों और रिश्तेदारों को मरीज बनने के लिए मनाने की मजबूरी

असफल होने का भय

यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर संकेत करती है।

कॉलेज छात्र को मरीज नहीं बना सकते

छात्रों का दावा है कि संदेश में यह भी लिखा गया कि कॉलेज के किसी भी छात्र को मरीज के रूप में नहीं लाया जाए। यदि ऐसा पाया गया तो लाने और आने वाले दोनों पर कठोर कार्रवाई होगी। यह निर्देश इस ओर संकेत करता है कि पूर्व में छात्र एक-दूसरे को “डमी मरीज” बनाकर परीक्षा प्रक्रिया पूरी करते रहे होंगे। यदि ऐसा है, तो यह संस्थागत स्तर पर गंभीर अनियमितता का संकेत है।

डीन का पक्ष

जब इस विषय में डेंटल कॉलेज के डीन से संपर्क किया गया तो उन्होंने आरोपों को पूरी तरह नकार दिया। उनका कहना है कि कॉलेज की ओपीडी में नियमित मरीज आते हैं और बाहरी मरीज लाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी ओर से ऐसा कोई संदेश जारी नहीं किया गया।

नियामक संस्थाओं के नियम क्या कहते हैं?

National Medical Commission (NMC) तथा Dental Council of India के दिशानिर्देशों के अनुसार किसी भी मान्यता प्राप्त मेडिकल या डेंटल कॉलेज के पास पर्याप्त संख्या में ओपीडी मरीज और क्लीनिकल मैटेरियल होना अनिवार्य है। परीक्षा के लिए मरीज उपलब्ध कराना संस्थान की जिम्मेदारी है, न कि छात्र की।


यदि छात्रों के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल शैक्षणिक अनियमितता नहीं, बल्कि भविष्य के डॉक्टरों की प्रशिक्षण प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।