नई दिल्ली, 18 अप्रैल
लोकसभा में शुक्रवार को केंद्र सरकार का परिसीमन विधेयक, 2026 आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल न कर पाने के कारण पारित नहीं हो सका। मतदान के समय उपस्थित 528 सदस्यों में से 298 ने समर्थन में और 230 ने विरोध में मतदान किया, जबकि विधेयक पारित करने के लिए 352 मतों की जरूरत थी।
संसदीय बहस के दौरान सरकार ने विधेयक को महिला प्रतिनिधित्व और एससी/एसटी सीटों में वृद्धि से जोड़कर पेश किया, जबकि विपक्ष ने इसे “राजनीतिक रूप से प्रेरित” कदम बताते हुए आरोप लगाया कि असल उद्देश्य विपक्ष को महिला विरोधी के रूप में पेश करना है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बहस में कहा कि परिसीमन का विरोध करना महिलाओं और वंचित वर्गों के हितों के खिलाफ है और विपक्ष को इसके लिए “महिला मतदाताओं के आक्रोश” का सामना करना पड़ सकता है।
विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इस दलील को खारिज किया और कहा कि विधेयक का मूल मुद्दा 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण है, न कि महिला आरक्षण। उनका कहना था कि महिला आरक्षण को राजनीतिक रूप से इस विधेयक के साथ जोड़कर वास्तविक बहस से ध्यान हटाने की कोशिश की गई।
विपक्ष ने यह भी तर्क दिया कि प्रस्तावित परिसीमन से राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा होगा और विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि यह प्रस्ताव असमानता को बढ़ावा देगा, जबकि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया कि दक्षिण भारत की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है और यह संघीय ढांचे के विपरीत है।
संसदीय कार्यवाही के दौरान विपक्ष की एकजुटता स्पष्ट दिखी, जिसके चलते सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में विफल रही। विधेयक के पारित न होने के बाद सरकार ने इसे वापस ले लिया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में महिला आरक्षण का मुद्दा केंद्रीय बहस से अधिक राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनकर उभरा, जबकि वास्तविक विवाद परिसीमन और प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर केंद्रित रहा।
