इंदौर। जेन ज़ी (Gen Z) पीढ़ी डिजिटल ओवर-असिस्टेंस और कोविड-19 के बाद के प्रभावों के चलते कई गंभीर मानसिक और शैक्षणिक चुनौतियों का सामना कर रही है।

एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित डॉ. अंशु भाटी के लेख के मुताबिक, महामारी का प्रभाव इस पीढ़ी पर अब भी कायम है। एक छात्र के हवाले से कहा गया कि “मेरे लिए कोविड का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है,” जो इस बात की ओर इशारा करता है कि सामाजिक रूप से आगे बढ़ने के बावजूद युवा वर्ग अब भी अलगाव और डिजिटल निर्भरता से जूझ रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, हालिया शोध संकेत देते हैं कि जेन ज़ी संभवतः पहली ऐसी पीढ़ी हो सकती है, जिसमें संज्ञानात्मक क्षमताओं में गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके चलते उन्हें अक्सर ‘आलसी’ या ‘कम प्रतिबद्ध’ जैसे विशेषणों से जोड़ा जाता है, हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह धारणा उनके सामने मौजूद बाहरी दबावों को नजरअंदाज करती है।

लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि कोविड-19 के दौरान कक्षा आधारित शिक्षा बाधित होने से पढ़ने-लिखने जैसी बुनियादी क्षमताओं पर असर पड़ा। इसके बाद डिजिटल माध्यमों के अत्यधिक उपयोग ने युवाओं को लगातार ऑनलाइन रहने की स्थिति में ला दिया, जिससे गहन सोच और आत्मचिंतन प्रभावित हो रहा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग को भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है। लेख के अनुसार, AI एक प्रभावी उपकरण है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग आलोचनात्मक सोच और बौद्धिक भागीदारी को कमजोर कर सकता है।

हालांकि, लेख में यह भी रेखांकित किया गया है कि जेन ज़ी में क्षमता की कमी नहीं है। वे एक तेजी से बदलते तकनीकी परिवेश में खुद को ढाल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पीढ़ी को समर्थन देने के साथ-साथ उनकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है, बजाय इसके कि उन्हें नकारात्मक लेबल दिए जाएं।

लेख के अनुसार, बदलाव के लिए युवाओं को भी आत्ममंथन करते हुए समर्पण, निष्ठा और अनुकूलनशीलता जैसे मूल्यों को अपनाना होगा। केंद्रित प्रयासों के माध्यम से वे इन चुनौतियों को अवसर में बदल सकते हैं।


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