सोशल मीडिया के दौर में किताबों की बढ़ी मांग

इंदौर, 26 अक्टूबर 2026: डिजिटल और सोशल मीडिया क्रांति का असर अब साहित्यिक जगत में भी दिखाई देने लगा है। यह धारणा टूट रही है कि आज की युवा पीढ़ी, खासकर जेन-जी (Gen Z), किताबों से दूर हो रही है। वाणी प्रकाशन समूह की सीईओ अदिति माहेश्वरी के मुताबिक, पिछले वर्ष प्रकाशन समूह की बिक्री में 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर चर्चा में रहने वाले समसामयिक मुद्दों और कंटेंट के कारण युवा संबंधित पुस्तकों को तलाशकर पढ़ रहे हैं। माहेश्वरी ने एक वार्ता में पत्रकारों के प्रश्नों के जवाब में जानकारी देते हुए बताया ।

माहेश्वरी ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि आज के युवाओं की रुचि केवल नई किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे क्लासिक साहित्य और पुराने उपन्यासों की ओर भी लौट रहे हैं। गुनाहों का देवता, लज्जा, मुझे चाँद चाहिए, पीली छतरी वाली लड़की और युगंधर जैसी किताबें युवा पाठकों के बीच फिर से लोकप्रिय हो रही हैं। फिल्म छावा के आने के बाद संभाजी, पुस्तक को ढूंढ कर पढ़ा गया।

प्रकाशकों की बैकलिस्ट की किताबें बनीं फ्रंट लिस्ट

अदिति माहेश्वरी के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में साहित्यिक पुस्तकों की बैकलिस्ट यानी पहले प्रकाशित हो चुकी किताबों की मांग में उल्लेखनीय बदलाव आया है। कई ऐसी पुस्तकें, जो लंबे समय से चर्चा में नहीं थीं या आउट ऑफ प्रिंट हो चुकी थीं, उन्हें पाठक दोबारा खोज रहे हैं। ऐसे में प्रकाशकों को अपने पुराने स्टॉक की जांच कर किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि वाणी प्रकाशन समूह साल में 200 से अधिक पुस्तक मेलों का आयोजन करता है। इन मेलों में बच्चों और युवाओं की भागीदारी यह संकेत देती है कि पढ़ने की संस्कृति खत्म नहीं हुई है। माता-पिता भी छोटे बच्चों को लेकर पुस्तक मेलों में पहुंच रहे हैं।

सोशल मीडिया बना किताबों के प्रचार का बड़ा माध्यम

माहेश्वरी ने कहा कि प्रकाशन उद्योग के सामने किताबों के विज्ञापन और प्रदर्शन के सीमित विकल्प रहे हैं। सोशल मीडिया ने प्रकाशकों को अपनी पुस्तकों के प्रचार के लिए एक नया मंच दिया है। रील, पोस्ट और पाठकों के अनुभवों के माध्यम से किताबों की चर्चा अधिक लोगों तक पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि किताबों के साथ सेल्फी साझा करना और उनके बारे में दूसरों को बताना भी प्रचार का प्रभावी माध्यम बन गया है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी पुस्तक की लोकप्रियता में पाठकों के बीच होने वाली चर्चा यानी ‘वर्ड ऑफ माउथ’ की अहम भूमिका रहती है।

इतिहास, मनोविज्ञान और व्यंग्य में भी रुचि

युवाओं की पसंद के बारे में माहेश्वरी ने बताया कि युवा नॉन-फिक्शन ज्यादा पढ़ रहे हैं जिसमें इतिहास, भारतीय ज्ञान परंपरा और मनोविज्ञान से जुड़ी पुस्तकों को पढ़ा जा रहा है। व्यंग्य सबसे अधिक पढ़ा जा रहा है। आजकल युवा ख्यात लेखक हरिशंकर परसाई और शरद जोशी की बात करते हुए मिलते हैं। शरद जोशी के दशकों पहले लिखे गए व्यंग्य आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में भी प्रासंगिक नजर आते हैं।

मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ रहा पढ़ने का रुझान

माहेश्वरी ने बताया कि पहले पुस्तक बिक्री और पाठकीय रुझान में उत्तर प्रदेश, बिहार और कुछ हद तक महाराष्ट्र का योगदान प्रमुख माना जाता था। अब मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी किताबों के प्रति रुचि उल्लेखनीय रूप से बढ़ रही है।

उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को साहित्य के संपादन और लेखन को निखारने में मददगार बताया। साथ ही कहा कि टेलीविजन, सोशल मीडिया और ई-बुक जैसे माध्यमों के आने के बावजूद पुस्तकों का महत्व बना रहेगा।

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