इंदौर। ✒️ अक्षय जैन (नाकोड़ा)

भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक जैन समाज का सर्वोच्च आस्था पर्व है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह के शाश्वत संदेश का सार्वजनिक उद्घोष है। किंतु विडंबना यह है कि जिस महापुरुष ने समन्वय और सह-अस्तित्व की राह दिखाई, उनके जन्मोत्सव की तिथि को लेकर समाज स्वयं दो धाराओं में बंटा दिखाई देता है।

साल 2026 में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की तिथि अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार दो दिनों 30 और 31 मार्च में पड़ रही है। श्वेतांबर जैन समाज 31 मार्च को जन्म कल्याणक मना रहा है, जबकि दिगम्बर जैन समाज 30 मार्च को। यह अंतर आस्था का नहीं, बल्कि पंचांग गणना की पद्धति का है। एक परंपरा सूर्योदय की विद्यमान तिथि को आधार मानती है, तो दूसरी तिथि-प्रवेश को महत्व देती है।

प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी गणना शुद्ध है। प्रश्न यह है कि क्या गणना-पद्धति का मतांतर सार्वजनिक उत्सव की एकता में बाधा बनना चाहिए?

जैन दर्शन का मूल तत्व अनेकांत है अर्थात सत्य को अनेक दृष्टियों से स्वीकार करना। यदि हम अनेकांत के सिद्धांत को व्यवहार में उतारें, तो यह मतभेद टकराव का कारण नहीं, बल्कि समन्वय का अवसर बन सकता है। दोनों परंपराएँ अपनी-अपनी तिथि पर धार्मिक विधि-विधान संपन्न करें, यह उनकी आस्था और परंपरा का विषय है। परंतु शहर, जिला या राष्ट्रीय स्तर पर एक संयुक्त आयोजन, संयुक्त शोभायात्रा और संयुक्त संदेश का मंच क्यों नहीं बन सकता?

आज जैन समाज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है युवा पीढ़ी का दूराव, संगठनात्मक विखंडन और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा उनके बीच जन्म कल्याणक जैसा अवसर एकता का प्रतीक बन सकता है। समाज के भीतर बिखराव का संदेश जाने के बजाय यदि संयुक्त आयोजन की तस्वीर सामने आए, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

महावीर का संदेश केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, वह आचरण का संदेश था। यदि हम अहिंसा को मानते हैं तो विचारों की कठोरता भी त्यागनी होगी। यदि हम अपरिग्रह को स्वीकारते हैं तो ‘मेरी तिथि, मेरा आग्रह’ की मानसिकता भी छोड़नी होगी। और यदि अनेकांत हमारे दर्शन का आधार है, तो भिन्न परंपराओं के अस्तित्व को स्वीकारते हुए एक साझा मंच बनाना ही उसकी सच्ची साधना है।

समय की मांग है कि जैन समाज यह स्पष्ट संदेश दे — तिथि भिन्न हो सकती है, पर भावना एक है। जन्म कल्याणक का पर्व विभाजन की रेखा नहीं, बल्कि एकता का सेतु बने। निर्णय नेतृत्व के हाथ में है, पर अपेक्षा पूरे समाज की है कि महावीर के नाम पर मतभेद नहीं, बल्कि मिलन का अध्याय लिखा जाए।