दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश बरकरार
नई दिल्ली/ इंदौर, 05 मार्च 2026 : सर्वोच्च न्यायालय SUPREME COURT ने टी. चोइथराम फाउंडेशन से जुड़े बहुचर्चित ट्रस्ट विवाद में सतीश मोतियानी एवं अन्य की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का कोई उचित आधार नहीं है और सभी लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए। याची की ओर से अधिवक्ता निदेश गुप्ता ने पैरवी की और प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने पैरवी की।
क्या है पूरा मामला?
टी. चोइथराम फाउंडेशन एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास है, जिसकी स्थापना स्वर्गीय ठाकुरदास चोइथराम पगारानी ने सन् 1971 में की थी। नवंबर 2021 में फाउंडेशन की ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में एक वाद दायर किया गया, जिसमें मोतियानी एवं अन्य को अवैध रूप से न्यासी पद पर आसीन बताते हुए उन्हें trustees de son tort (अनधिकृत न्यासी) घोषित करने की माँग की गई। वादपत्र में आरोप लगाया गया कि 1992 से 2021 के बीच की गई नियुक्तियाँ ट्रस्ट डीड का सीधा उल्लंघन हैं।
इस पर अपीलकर्ताओं ने वादपत्र अस्वीकृति का आवेदन दाखिल किया, जिसे एकल न्यायाधीश ने खारिज कर दिया। उस आदेश के विरुद्ध खंडपीठ में अपील की गई, जहाँ भी 20 दिसंबर 2025 को अपील खारिज हुई। अंततः सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया, जहाँ भी याचिकाकर्ताओं को निराशा ही हाथ लगी।
उच्च न्यायालय ने क्या कहा था?
दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने दो महत्त्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर विचार करते हुए अपीलकर्ताओं के तर्क नकारे थे:
पहला — धारा 92 CPC का प्रश्न: न्यायालय ने माना कि जब न्यास स्वयं वादी हो और वह अतिक्रमणकारियों से अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए वाद करे, तो CPC की धारा 92 के अंतर्गत पूर्व अनुमति अनिवार्य नहीं है। यह प्रावधान जनता के सदस्यों द्वारा दायर वादों पर लागू होता है, न कि स्वयं न्यास द्वारा दायर वादों पर। साथ ही कहा गया कि अनुमति न लेना एक सुधार योग्य त्रुटि है, घातक दोष नहीं।
दूसरा — परिसीमा का प्रश्न: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि 1996 से विवाद की जानकारी होने के बावजूद वाद 2021 में दायर किया गया, इसलिए यह परिसीमा से बाधित है। न्यायालय ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि जब अवैध कब्जा प्रतिदिन जारी हो तो यह सतत अन्याय (continuing wrong) की श्रेणी में आता है और परिसीमा का यह मिश्रित प्रश्न बिना विचारण के तय नहीं किया जा सकता।
मामले का महत्त्व
यह निर्णय सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों की कानूनी सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह सिद्धांत पुष्ट हुआ है कि:
सार्वजनिक न्यास अपनी संपत्ति एवं प्रशासन की रक्षा के लिए सामान्य दीवानी वाद दायर कर सकता है।
धारा 92 CPC अनिवार्यतः हर ट्रस्ट मामले पर लागू नहीं होती।
अवैध कब्जे जैसे सतत अन्याय में परिसीमा का प्रश्न विचारण में ही तय होगा।
अब यह वाद दिल्ली उच्च न्यायालय में विचारण के लिए आगे बढ़ेगा।
