भोजशाला–कमाल मौला विवाद: सुप्रीम कोर्ट का आदेश, रिपोर्ट खुलेगी, यथास्थिति बनी रहेगी
नई दिल्ली , 28 जनवरी 2026:
धार जिले की ऐतिहासिक भोजशाला सरस्वती मंदिर–कमाल मौला मस्जिद विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक हाई कोर्ट इस मामले में अंतिम फैसला नहीं करता, तब तक स्थल के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है और अंतिम निर्णय मध्यप्रदेश हाई कोर्ट, इंदौर पीठ द्वारा ही किया जाएगा।
ASI का सर्वे पूरा, रिपोर्ट सीलबंद
कोर्ट को बताया गया कि हाई कोर्ट के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किया गया वैज्ञानिक सर्वे पहले ही पूरा हो चुका है। यह सर्वे सुप्रीम कोर्ट के 1 अप्रैल 2024 के अंतरिम आदेश से पहले शुरू हो गया था। सर्वे रिपोर्ट फिलहाल हाई कोर्ट के पास सीलबंद लिफाफे में रखी है।
रिपोर्ट खुलेगी, दोनों पक्षों को मिलेगी प्रति
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि हाई कोर्ट की खंडपीठ रिपोर्ट को खुली अदालत में खोलेगी और उसकी प्रतियां दोनों पक्षों को उपलब्ध कराई जाएंगी। यदि रिपोर्ट का कोई हिस्सा प्रतिलिपि योग्य नहीं हुआ, तो पक्षकार अपने वकीलों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में उसका निरीक्षण कर सकेंगे।
आपत्तियों के लिए समय, फिर अंतिम सुनवाई
रिपोर्ट मिलने के बाद दोनों पक्षों को दो सप्ताह का समय दिया जाएगा, ताकि वे अपनी आपत्तियां, राय और सुझाव प्रस्तुत कर सकें। इसके बाद हाई कोर्ट मामले की अंतिम सुनवाई करेगा और सभी दलीलों पर विचार कर फैसला सुनाएगा।
यथास्थिति बनाए रखने का आदेश
कोर्ट ने कहा है कि जब तक रिट याचिका का अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक भोजशाला सरस्वती मंदिर-कमाल मौला मस्जिद के स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। साथ ही 7 अप्रैल 2003 को ASI के महानिदेशक द्वारा जारी आदेश का पालन जारी रहेगा।
मामले का संक्षिप्त पृष्ठभूमि
यह विवाद धार स्थित एक ऐतिहासिक स्थल को लेकर है। एक पक्ष इसे भोजशाला सरस्वती मंदिर बताता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे मौलाना कमाल मौला मस्जिद मानता है। इसी विवाद को लेकर हाई कोर्ट में रिट याचिका लंबित है।
हाई कोर्ट को 3 सप्ताह में सुनवाई का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि हाई कोर्ट, इंदौर पीठ में यह मामला तीन सप्ताह के भीतर एक खंडपीठ द्वारा सुना जाए, जिसकी अध्यक्षता वरीयता से मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठतम न्यायाधीश करें।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से स्पष्ट है कि फिलहाल किसी भी पक्ष को राहत नहीं दी गई है। अब पूरा मामला ASI की रिपोर्ट और पक्षकारों की आपत्तियों के आधार पर हाई कोर्ट तय करेगा।
