केवल Arnesh Kumar गाइडलाइन का हवाला देकर निपटाना गलत: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर रद्द (quashing) करने की याचिकाओं का निस्तारण हाईकोर्ट को मामले के गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर करना अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस को Arnesh Kumar vs State of Bihar (2014) के दिशा-निर्देशों का पालन करने का निर्देश देकर याचिका का निपटारा करना विधिसम्मत नहीं है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को निरस्त करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने संबंधित मामले में तथ्यों और कानून का परीक्षण किए बिना ही पुलिस को गिरफ्तारी संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करने को कहकर याचिका का निस्तारण कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कोई याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 या दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर की जाती है, तो हाईकोर्ट का दायित्व है कि वह उपलब्ध सामग्री और लागू कानून के आधार पर यह तय करे कि एफआईआर रद्द की जानी चाहिए या नहीं। केवल सामान्य निर्देश देकर याचिका समाप्त करना न्यायिक कर्तव्य का समुचित निर्वहन नहीं माना जा सकता।
यह मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के डुंडाहेरा गांव स्थित एक कब्रिस्तान तक पहुंच को लेकर उत्पन्न विवाद से जुड़ा है, जिसके चलते एक एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपियों ने एफआईआर रद्द कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय Pradeep Kumar Keserwani vs State of UP (2025) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी याचिकाओं पर विचार करते समय अदालत को प्रस्तुत सामग्री की विश्वसनीयता, आरोपों पर उसका प्रभाव, उसके खंडन की संभावना और यह देखना आवश्यक है कि क्या मुकदमा जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट ने इन पहलुओं पर विचार किए बिना याचिका का यांत्रिक तरीके से निस्तारण किया, जो विधिसम्मत नहीं है। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि याचिका पर मेरिट के आधार पर नया निर्णय लिया जाए।
