राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने निजी स्कूलों में महंगी निजी प्रकाशकों की पुस्तकों के बजाय एनसीईआरटी और एससीईआरटी की किफायती किताबें लागू करने संबंधी अपने निर्देशों को लेकर बड़ा बयान दिया है।
उन्होंने कहा कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के हित में दिए गए इस आदेश को शिक्षा माफिया दबाव बनाकर पलटवाने, स्थगित करवाने या रोकने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
कानूनगो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया कि उन्होंने बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम (PHR Act 1993) के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राज्य सरकारों को निर्देश जारी किए थे कि निजी स्कूलों में बच्चों पर महंगी किताबों का आर्थिक बोझ कम करने के लिए एनसीईआरटी और एससीईआरटी पाठ्यपुस्तकों को प्राथमिकता दी जाए।
उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा माफिया अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए साम, दाम, भेद जैसी रणनीतियों का सहारा ले रहा है। कानूनगो ने स्पष्ट किया कि भारत के गरीब और मिडिल क्लास परिवारों के बच्चों की सस्ती और सुलभ शिक्षा के लिए यह संघर्ष जारी रहेगा।
उन्होंने कहा, “हम भारत के गरीब-मिडिल क्लास परिवारों की लड़ाई लड़ते रहेंगे, क्योंकि यह देश हमारा है।”
कानूनगो के इस बयान को शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त व्यावसायीकरण और निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षा क्षेत्र में बढ़ती लागत और निजी प्रकाशकों की अनिवार्य पुस्तकों को लेकर लंबे समय से अभिभावकों में असंतोष बना हुआ है।
