इंदौर। डेवलपमेंट फाउंडेशन द्वारा जाल सभागृह में “वर्तमान परिस्थिति में महिलाओं की भूमिका” विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं वरिष्ठ नागरिकों ने भाग लेकर अपने विचार साझा किए। चर्चा में महिलाओं की बदलती भूमिका, सामाजिक चुनौतियां, पारिवारिक मूल्यों, शिक्षा, रोजगार और समाज में उनकी भागीदारी जैसे विषयों पर व्यापक मंथन किया।


कार्यक्रम के प्रारंभ में पर्यावरण विद सुश्री मेघा बर्वे ने कहा की वर्तमान में लड़कियों की शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है और वे आर्थिक रूप से भी सक्षम बन रही हैं। महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, लेकिन उच्च पदों और निर्णय लेने वाले स्तर पर उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है। उन्होंने कहा कि समाज में बदलती जीवनशैली और कुछ सामाजिक प्रवृत्तियों के दीर्घकालिक प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

पत्रकार सुश्री नेहा जैन ने कहा कि देश की आधी आबादी महिलाएं हैं, तो निर्णय लेने वाली जगहों पर उनकी भागीदारी केवल 13–14 प्रतिशत क्यों है। उन्होंने कहा कि भारत में आज भी महिला श्रम भागीदारी लगभग 33–35 प्रतिशत के आसपास है। यह महिलाओं की क्षमता का नहीं बल्कि अवसर और समान भागीदारी का प्रश्न है। समाज के विकास के लिए महिलाओं को केवल सशक्त बनाने की नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी देने की आवश्यकता है।

वरिष्ठ शिक्षक शोभा वैद्य ने कहा कि समाज के प्रमुख आधार परिवार, धर्म, राज्य और शिक्षा हैं, लेकिन वर्तमान समय में मूल्यों में गिरावट देखने को मिल रही है। उन्होंने महिलाओं की भूमिका को समाज और संस्कृति के संरक्षण से जोड़ा।

सामाजिक कार्यकर्ता सुमन ज्ञानी ने कहा कि महिलाओं में सहनशीलता और परिवार की आवश्यकताओं को समझने की सहज क्षमता होती है। उन्होंने कहा कि महिला और पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं तथा समाज की प्रगति में दोनों की समान भूमिका है।

सुश्री संगीता भारुका ने कहा कि वर्तमान समय में महिलाएं घर और कार्यस्थल दोनों जगह दोहरी जिम्मेदारी निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि तुलना के बजाय महिलाओं की सहभागिता और योगदान को महत्व दिया जाना चाहिए।

सुश्री रंजना नाइक ने सामाजिक बदलावों और परिवार व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान समय में पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता है।

डॉ. पूनम माथुर ने कहा कि महिलाओं पर आज दोहरी और कई बार तिहरी जिम्मेदारियां आ रही हैं। गृहिणियों की भूमिका को भी समान सम्मान और महत्व दिए जाने की आवश्यकता है।

श्रीमती मीना श्रीवास्तव ने कहा कि संस्कारों की पहली पाठशाला परिवार होता है और बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।

सुश्री प्राणिता दीक्षित ने कहा कि महिलाओं की जो नकारात्मक छवि कभी-कभी समाज में दिखाई देती है, उसके पीछे लंबे समय तक झेली गई पीड़ा, संघर्ष और सामाजिक दबाव भी एक कारण हो सकते हैं।

परिचर्चा में सामाजिक कार्यकर्ता रेहाना खान, डॉ रमा चौहान , प्रो असद खान ,फादर पायस आदि ने भी भाग लिया।
इस अवसर पर सर्व रामेश्वर गुप्ता, राजू सैनी, शफ़ी शेख एवं अशोक मित्तल आदि भी उपस्थित थे।

कार्यक्रम के अंत में फाउंडेशन के प्रबंध ट्रस्टी आलोक खरे ने आभार व्यक्त किया।