NSICON 2025 का चौथा दिन
“मेडिकल साइंस हो या देश की सुरक्षा—तकनीकी रूप से आगे रहना ही सफलता की कुंजी” : जनरल वी.पी. मलिक
इंदौर, 13 दिसंबर 2025। न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के वार्षिक सम्मेलन एनएसआईकॉन 2025 के चौथे दिन वैज्ञानिक, सैन्य और मानवीय दृष्टिकोण का अनूठा संगम देखने को मिला। ब्रिलिएंट कन्वेन्शन सेंटर में आयोजित इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 200 से अधिक शोध पत्रों पर गहन चर्चा हुई। इस वर्ष की थीम — “ब्रेन और स्पाइन देखभाल में चुनौतियों पर विजय” — के अनुरूप भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक को विशेष वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया।
कारगिल से सीख: जज्बा और तकनीक ही जीत की असली ताकत
अपने प्रेरक संबोधन में जनरल मलिक ने कारगिल युद्ध के अनुभव साझा करते हुए कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद सैनिकों का साहस, अनुशासन और जीतने का जुनून ही विजय की सबसे बड़ी वजह बना। उन्होंने कहा, “चुनौतियों के सामने कभी घुटने नहीं टेकने की मानसिकता ही कारगिल में हमारी जीत का आधार बनी।”
सैन्य चिकित्सा की मिसाल
वर्ष 1999 में कारगिल वार के दौरान भारतीय सेना का नेतृत्व करने वाले जनरल मलिक ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान हजारों घायल सैनिकों को अस्पतालों में भर्ती किया गया था, जिनमें से मात्र 10–15 सैनिकों की मृत्यु हुई। यह आंकड़ा सैन्य चिकित्सा व्यवस्था की दक्षता, त्वरित उपचार और डॉक्टरों के समर्पण को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में कई हथियार और तकनीकें विदेशों से मंगानी पड़ती थीं, जबकि आज भारत रक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय आत्मनिर्भरता हासिल कर चुका है।
ऑपरेशन सिंदूर और आधुनिक युद्ध
जनरल मलिक ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अभियान में भी वही जज्बा था, लेकिन इस बार उन्नत तकनीक ने निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि समय के साथ नई तकनीकों को अपनाना जीवन और पेशे—दोनों के लिए अनिवार्य है। उन्होने आगे कहा कि आज भारतीय सेना हर युद्ध का जवाब देने में सक्षम है।
वैज्ञानिक सत्र: आधुनिक न्यूरोसर्जरी की दिशा
दिन भर चले वैज्ञानिक सत्रों में स्कल बेस सर्जरी, कम चीरे वाली तकनीकों और तेज रिकवरी से जुड़े नवीन शोध प्रस्तुत किए गए। विशेषज्ञों ने बताया कि मिनिमली इनवेसिव सर्जरी अब आधुनिक न्यूरोसर्जरी की पहचान बन चुकी है।
भारतीय सशस्त्र बलों के न्यूरोसर्जनों ने युद्धकालीन परिस्थितियों में ब्रेन इंजरी और ट्रॉमा मैनेजमेंट पर अपने अनुभव साझा किए, जो सैन्य और नागरिक चिकित्सा के बढ़ते सहयोग का सशक्त उदाहरण बने।
डॉक्टर भी योद्धा हैं: डॉ. वसंत डाकवाले
ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन डॉ. वसंत डाकवाले ने कहा, “ आज के स्पेशल वक्ता जनरल वी.पी मलिक ने सभी डॉक्टर्स को प्रोत्साहित किया और सभी डॉक्टर्स को भी सैनिक की तरह ही जीतने का जज्बा रखना चाहिए और कभी भी चुनौतियों से नहीं हारना चाहिए और समय के साथ टेक्नोलॉजी को अपनाना चाहिए l अपने आपको न्यूरोसर्जरी अब सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि विज्ञान, अनुभव और संवेदना का संतुलित समन्वय है। मरीज की गरिमा और जीवन की गुणवत्ता को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइन्स, बैंगलोर से आए वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ द्वारकाप्रसाद श्रीनिवास ने न्यूजओ2 से चर्चा में कहा कि समय के साथ न्यूरोसाइन्स काफी उन्नत हुई है, तकनीक से इलाज पहले से सुगम हुआ है, अक्सर रोड एक्सीडेंट में हेड इंजुरी होने के चांस होते हैं, इसलिए दो पहिया पर हेलमेट और कार में सीट बेल्ट पहनना बहुत जरूरी है। हेलमेट और सीट बेल्ट सीवियर हेड इंजूरी से बचाते हैं। न्यूरोलोजी में महंगे इलाज के एक प्रश्न के जवाब में डॉ श्रीनिवास ने कहा कि न्यूरोलोजी में सरकारी अस्पतालों में काफी हद तक उपचार उपलब्ध है और भारत सरकार की आयुष्मान भारत योजना में भी अच्छा इलाज उपलब्ध हो रहा है।
अमेरिका से आए विश्व प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ. केनन आर्टानोविक ने जैकब चांडी ओरशन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों में आज भी समय पर सर्जरी सबसे प्रभावी उपचार है और इलाज में देरी घातक हो सकती है।
डॉक्टरों की सेहत पर फोकस
दोपहर बाद आयोजित “वेलनेस इन न्यूरोसर्जरी” सत्र में डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य और रचनात्मकता पर विशेष ध्यान दिया गया। लाइव म्यूजिकल वर्कशॉप के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि दूसरों की जान बचाने वाले डॉक्टरों की अपनी सेहत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
पोस्ट-सर्जरी लापरवाही खतरनाक
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. जे.एस. कठपाल ने पोस्ट-सर्जरी देखभाल को लेकर चेतावनी देते हुए कहा,“मरीज अक्सर डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से नहीं लेते, जिससे संक्रमण, पुनः रक्तस्राव और गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं।”
प्रशिक्षण प्रणाली में बदलाव की मांग
समापन सत्र में न्यूरोसर्जरी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सुधार की आवश्यकता पर चर्चा हुई। वरिष्ठ विशेषज्ञों ने मौजूदा तीन वर्षीय प्रशिक्षण प्रणाली को अधिक व्यावहारिक और समान बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने विभिन्न प्रशिक्षण केंद्रों में अनिवार्य रोटेशन सिस्टम लागू करने की वकालत की, ताकि सभी प्रशिक्षुओं को समान और व्यापक अनुभव मिल सके।
