13 फरवरी तक बताना होगा—छात्र परीक्षा कैसे देगा ?
बच्चे की शिक्षा बाधित न हो — सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता
नई दिल्ली/इंदौर, 07 फरवरी 2026: इंदौर के एक निजी आईसीएसई स्कूल से निष्कासित 14 वर्षीय छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम हस्तक्षेप करते हुए ICSE बोर्ड, लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल, मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग, इंदौर कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों से 13 फरवरी 2026 तक यह स्पष्ट करने को कहा है कि छात्र को परीक्षा में शामिल कराने की व्यवहारिक व्यवस्था कैसे की जा सकती है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना और उज्जल भुयान की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि बच्चे की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए और यह मामला केवल अनुशासन का नहीं, बल्कि छात्र के शैक्षणिक भविष्य से सीधे जुड़ा है। इसलिए त्वरित समाधान आवश्यक है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी प्राधिकरण अपने-अपने स्तर पर यह बताएं—
छात्र को बोर्ड परीक्षा में शामिल कराने का तरीका क्या होगा
किस संस्था की क्या जिम्मेदारी होगी ?
शिक्षा जारी रखने के लिए कौन-सी वैकल्पिक व्यवस्था संभव है ?
अदालत ने संकेत दिए कि समाधान ऐसा हो जिससे छात्र का शैक्षणिक वर्ष और परीक्षा प्रभावित न हों।
मामला क्या है ?
यह प्रकरण एक 14 वर्षीय छात्र से जुड़ा है, जिस पर आरोप है कि उसने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर इंस्टाग्राम पर एक निजी अकाउंट बनाया और शिक्षकों के खिलाफ आपत्तिजनक मीम्स साझा किए। स्कूल प्रबंधन ने इस आधार पर छात्र को आगे की कक्षाओं से वंचित/निष्कासित कर दिया। उल्लेखनीय है इंदौर हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद याची ने सुप्रीम कोर्ट का दरबाजा खटखटाया है।
सुप्रीम कोर्ट में दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता निपुण सक्सेना ने दलील दी कि कथित कदाचार की तुलना में दी गई सजा पूरी तरह असंगत और अनुपातहीन है। उन्होंने कहा कि आरोप सिद्ध नहीं हुए, फिर भी निचली अदालतों ने यह मान लिया कि मीम्स उसी छात्र ने साझा किए। 13–14 वर्ष के बच्चे पर आपराधिक मंशा (mens rea) नहीं थोपी जा सकती। इस तरह की कार्रवाई से स्कूलों को बच्चों के मोबाइल और निजी जीवन पर असीमित निगरानी का अधिकार मिल जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि हाईकोर्ट ने बच्चे के पश्चाताप को स्वीकार किया, लेकिन “समाज को सख्त संदेश” देने की बात कहते हुए राहत नहीं दी।
अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 13 फरवरी 2026 को होगी। सभी पक्ष अपने जवाब दाखिल करेंगे, जिसके बाद अदालत छात्र को परीक्षा में शामिल कराने और निष्कासन की वैधता व दंड की अनुपातिकता पर आदेश पारित कर सकती है। बोर्ड परीक्षा और शैक्षणिक सत्र को देखते हुए यह सुनवाई अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
एक्सपर्ट व्यू : क्या कहते हैं बाल कानून विशेषज्ञ ?

बाल कानून विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ कृपा शंकर चौबे का कहना है कि निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला देगा वह नजीर बनेगा, उससे इस क्षेत्र में काम करने वालों को मार्गदर्शन मिलेगा। डॉ चौबे ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में स्कूल की कार्रवाई पूरी तरह गलत है और यह किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की मूल भावना के विपरीत है। डॉ. चौबे ने कहा कि किसी बालक को स्कूल से निकाल देना किशोर न्याय अधिनियम की धारा 24 का उल्लंघन है। यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि बालक द्वारा किए गए किसी भी कृत्य का उसके भविष्य पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा, चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में बाल संरक्षण आयोग के परामर्श को अस्वीकार करते हुए निजी स्कूल की कार्रवाई को सही ठहराया गया, तो आगे चलकर छोटी-छोटी घटनाओं पर भी बच्चों को स्कूल से निष्कासित करने की और स्कूल प्रबंधन की मनमानी करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जो पूरे प्रदेश के बच्चों के लिए घातक साबित होगी।
