लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल, इंदौर मामले में याचिका खारिज

इंदौर, 10 अक्टूबर 2025: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने लिटिल वंडर्स कॉन्वेंट स्कूल से निष्कासित छात्र के पक्ष में दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि विद्यालय को अनुशासन बनाए रखने का अधिकार है और बाल अधिकार आयोग (SCPCR) के आदेश केवल सलाहात्मक हैं, बाध्यकारी नहीं।
यह आदेश न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की एकलपीठ ने रिट याचिका क्रमांक 22258/2025 में सुनाया।

कोर्ट का यह ऑर्डर आखिरी सुनवाई के पूरे एक महीने बाद 9 अक्टूबर को जारी हुआ है।

यहाँ सवाल उठता है, जब एक छात्र के भविष्य का सवाल है तो कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखते हुए एक महीने बाद ऑर्डर जारी क्यों किया ? अब छात्र के पास अन्य स्कूल के विकल्प का संकट खड़ा हो गया है !

प्रकरण की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता के अनुसार उनका 14 वर्षीय पुत्र, जो कक्षा 9 का छात्र था, को विद्यालय ने 4 फरवरी 2025 को बुलाकर निष्कासित कर दिया, यह आरोप लगाते हुए कि उसने दो अन्य विद्यार्थियों के साथ विद्यालय के नाम से एक इंस्टाग्राम पेज बनाकर शिक्षकों के मीम्स साझा किए। बच्चे ने तत्काल माफी मांगी, पर विद्यालय ने उसे आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दी। मामला म.प्र. राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) के संज्ञान में आने पर आयोग ने 3 अप्रैल 2025 को आदेश दिया था कि बच्चे को निष्कासित न किया जाए और उसकी काउंसलिंग कराई जाए।
विद्यालय ने इस आदेश को न मानते हुए कहा कि आयोग का निर्देश सिफारिश मात्र है।

हाईकोर्ट ने कहा — आयोग का आदेश बाध्यकारी नहीं
न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा ने कहा कि बाल अधिकार आयोग केवल एक परामर्शदात्री संस्था है, जिसे नीतिगत सुझाव देने का अधिकार है, पर वह किसी विवाद का निपटारा करने या बाध्यकारी आदेश देने की शक्ति नहीं रखती। न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की एकल पीठ के अनुसार विद्यालय का निर्णय अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में है, किसी दंडात्मक अपराध के नहीं, अतः किशोर न्याय अधिनियम 2015 या शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 इस मामले में लागू नहीं होते।

 मीम्स पर कड़ी टिप्पणी
न्यायालय ने विद्यालय द्वारा सीलबंद लिफाफे में पेश की गई कथित चैट्स और पोस्टों का परीक्षण कर कहा कि उनमें शिक्षकों के धर्म, शरीर और व्यक्तित्व पर अपमानजनक और साम्प्रदायिक टिप्पणियाँ थीं। अदालत ने इसे “अत्यधिक अनुशासनहीनता” बताते हुए कहा कि यह एकल घटना नहीं बल्कि लगातार दुर्व्यवहार का संकेत है।

अदालत का निष्कर्ष
अदालत ने पाया कि विद्यालय द्वारा जारी ट्रांसफर सर्टिफिकेट में “Good Character” लिखा गया है और अब छात्र किसी अन्य विद्यालय में प्रवेश ले सकता है।अदालत ने कहा कि विद्यालय के निर्णय में कोई अवैधानिकता नहीं है, इसलिए याचिका खारिज की जाती है।

याचिकाकर्ता की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि वे इस आदेश का अध्ययन कर रहे हैं और आगे इसे विधिवत चुनौती देंगे। उन्होंने कहा — “यह फैसला एकपक्षीय प्रतीत होता है। स्कूल के आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं की गई। अदालत ने केवल 3 अप्रैल 2025 के आदेश को ही केंद्र में रखा, जबकि आयोग ने 15 अप्रैल 2025 को इंदौर कलेक्टर को पत्र लिखकर JJ Act की धारा 75 के तहत स्कूल के विरुद्ध कार्यवाही के निर्देश भी दिए थे। एक ओर बाल अधिकार आयोग — जो विधिक रूप से बालकों के संरक्षण की शक्ति रखता है — स्कूल के आचरण को बालक के लिए प्रताड़ना मान चुका है, जबकि स्कूल ने उसी को अनुशासनात्मक कार्रवाई बताकर अपना बचाव कर लिया। JJ Act के सिद्धांतों के अनुसार यह व्यवहार अपराध की श्रेणी में आता है। हम निर्णय का पूरा अध्ययन कर रहे हैं और आगे इसे उच्च स्तर पर चुनौती देंगे।”

स्कूल का पक्ष

विद्यालय की ओर से अधिवक्ता तरंग चेलावत ने कहा कि तीनों छात्रों ने शिक्षकों की व्यक्तिगत तस्वीरों का दुरुपयोग करते हुए साम्प्रदायिक और अभद्र मीम्स बनाए, जिससे शिक्षकों का मनोबल गिरा और विद्यालय का वातावरण दूषित हुआ। विद्यालय ने जांच समिति बनाकर कार्रवाई की, छात्रों को परीक्षा देने दी लेकिन अगले सत्र में प्रवेश से रोका। उन्होंने कहा कि आयोग का आदेश बाध्यकारी नहीं है और विद्यालय प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखने के अपने अधिकार के तहत निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।

निर्णय का व्यापक प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश निजी स्कूलों में अनुशासनात्मक अधिकार और बाल अधिकार आयोग की सीमाओं के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण नज़ीर प्रस्तुत करता है। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से अब इस फैसले को अपील में चुनौती दिए जाने की संभावना बन गई है।

आदेश का महत्व

यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि —

1. बाल अधिकार आयोग (SCPCR) के आदेश केवल सिफारिशात्मक होते हैं;

2. विद्यालयीन अनुशासन में न्यायालय का दखल सीमित है;

3. और यदि विद्यालय ने न्यायसंगत प्रक्रिया अपनाई है, तो वह छात्र को आगे पढ़ाने से इनकार कर सकता है।

न्यूजओ2 सवाल पूछता है :

अगर बाल आयोग के पास शक्ति ही नहीं, तो यह संस्था आखिर किसके लिए है?
सिर्फ रिपोर्ट लिखने के लिए? या फिर सिस्टम की “नैतिक सजावट” के लिए? जनता के पैसों से ऐसे संस्थानों को क्यों चलाया जा रहा है ?

By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।