ऐतिहासिक दावों से लेकर संवैधानिक अधिकारों तक गरमाई बहस, फैसला सुरक्षित

इंदौर, 12 मई 2026। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर मंगलवार को बहुचर्चित और विस्तृत सुनवाई पूरी हो गई।

न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने हिंदू पक्ष, मुस्लिम पक्ष, केंद्र सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राज्य सरकार तथा विभिन्न हस्तक्षेपकर्ताओं की अंतिम दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत, संवैधानिक अधिकार और संपत्ति विवाद के जटिल प्रश्नों से जुड़ा हुआ है।

याचिका हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ट्रस्ट सहित विभिन्न पक्षों द्वारा दायर की गई थी, जिसमें भोजशाला को मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताते हुए हिंदू समुदाय को पूर्ण पूजा-अधिकार देने की मांग की गई है।

हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत में तर्क दिया कि भोजशाला ऐतिहासिक रूप से राजा भोज द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर है।

उन्होंने कहा कि ASI सर्वेक्षण, मंदिर स्थापत्य शैली, स्तंभों, मूर्तिकला अवशेषों और संस्कृत शिलालेखों से यह सिद्ध होता है कि यह मूलतः हिंदू धार्मिक स्थल था।

उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि 2003 की वर्तमान व्यवस्था केवल प्रशासनिक प्रबंधन है और इससे हिंदू पक्ष के मूल धार्मिक अधिकार सीमित नहीं किए जा सकते। हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड का दावा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक पर धार्मिक स्वामित्व का दावा स्वतः मान्य नहीं हो सकता।

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद सहित अन्य अधिवक्ताओं ने हिंदू पक्ष की मांग का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका वस्तुतः स्वामित्व (title suit) विवाद है, जिसे धार्मिक अधिकारों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

मुस्लिम पक्ष ने Places of Worship Act, 1991 का हवाला देते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 की स्थिति के बाद किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप में परिवर्तन की अनुमति नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि ASI रिपोर्ट या स्थापत्य अवशेष वर्तमान वैधानिक धार्मिक अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकते। साथ ही उन्होंने कहा कि मंदिर विध्वंस के निर्णायक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए हैं और लंबे समय से मुस्लिम समुदाय वहां नमाज अदा करता रहा है।

केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि भोजशाला एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है, जिसका संरक्षण प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व कानूनों के तहत किया जा रहा है।

केंद्र ने कहा कि धार्मिक उपयोग प्रशासनिक संतुलन के साथ नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन संरक्षित स्मारक की कानूनी स्थिति सर्वोपरि रहेगी। सुनवाई के दौरान वक्फ अधिसूचना की वैधता और प्रशासनिक अधिकारों पर भी गंभीर प्रश्न उठे।

राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष प्रशासनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। विभिन्न हस्तक्षेपकर्ताओं ने सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक संरक्षण से जुड़े अतिरिक्त तर्क रखे।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न रहे कि क्या यह मामला केवल पूजा-अधिकार का है या वास्तविक स्वामित्व विवाद, क्या Places of Worship Act लागू होता है, क्या ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य वर्तमान धार्मिक दावों को प्रभावित कर सकते हैं, और क्या वक्फ या हिंदू पक्ष में से किसी को प्राथमिक वैधानिक अधिकार प्राप्त है।

करीब चार वर्षों से विभिन्न याचिकाओं और अपीलों के रूप में चल रहे इस मामले में मंगलवार को सभी पक्षों की रीजॉइंडर बहस भी पूरी हो गई। इसके बाद हाईकोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया।

भोजशाला विवाद पर आने वाला फैसला केवल धार या मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे ज्ञानवापी, मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि और अन्य धार्मिक स्थल विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।

अब देशभर की निगाहें हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो धार्मिक विरासत और संवैधानिक न्यायशास्त्र दोनों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है.

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