पूर्व जन्म के कर्मों का फल अवश्य मिलता है, धर्म संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने का दिया संदेश
इंदौर, 6 अगस्त 2026 : मध्य प्रदेश के इंदौर में चातुर्मास कर रहे मुनिपुंगव मुनि सुधा सागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में यदि कोई सबसे अधिक शक्तिशाली है तो वह कर्म है। कर्म न तो किसी का मित्र होता है और न ही किसी पर दया करता है। इसलिए भगवान या गुरु से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से डरना चाहिए, क्योंकि कर्म किसी को भी नहीं छोड़ते।
समाज प्रचारक राजेश जैन ‘दददु‘ ने प्रेस विज्ञप्ति कारी कर बताया कि गुरुवार को देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए मुनिश्री ने कहा कि पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को भी सात माह सात दिन तक आहार की विधि प्राप्त नहीं हुई थी। इससे स्पष्ट है कि कर्म का प्रभाव सभी पर समान रूप से पड़ता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी के लिए धन-संपत्ति से अधिक संतान महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि उसी से वंश आगे बढ़ता है। विवाह केवल भोग-विलास का संबंध नहीं, बल्कि परिवार और संस्कारों की निरंतरता का माध्यम है। जिस प्रकार वंश और संपत्ति की रक्षा के लिए उत्तराधिकारी आवश्यक होता है, उसी प्रकार धर्म को जीवित रखने के लिए भी संस्कारवान वारिसों की आवश्यकता होती है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपनी संतानों को ऐसे संस्कार दें कि उनके बाद भी परिवार में धर्म जीवित रहे। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार यह नियम बना ले कि घर का हर सदस्य देव-दर्शन के बाद ही भोजन करेगा, तो धर्म और धार्मिक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहेंगी।
धर्मसभा का संचालन अनुराग जैन ने किया। इस अवसर पर आकाश कोल, प्रिंसिपल टोंग्या, सपना मनीष गोधा, आनंद नवीन गोधा, भूपेंद्र जैन, अखिलेश सोधिया, मुक्ता जैन, सोनाली बगड़िया सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
