इंदौर में वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ, न्याय तक पहुंच को आसान बनाने पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा- न्याय सुलभ, शीघ्र और मानवीय होना जरूरी
इंदौर, 8 अगस्त 2026। भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के प्रमुख संरक्षक न्यायमूर्ति सूर्यकांत और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शनिवार को इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस ‘Enhancing Access to Justice’ का शुभारंभ किया। सम्मेलन का आयोजन नालसा, मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। सम्मेलन 9 अगस्त तक चलेगा।
सम्मेलन की थीम ‘एकजुट आवाज, सशक्त भविष्य : संवाद, गरिमा और समावेशन के माध्यम से न्याय तक पहुंच’ रखी गई है। उद्घाटन अवसर पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने नालसा की शिक्षा स्कीम और थीम सॉन्ग को इंडियन साइन लैंग्वेज में लॉन्च किया। नालसा की योजनाओं के हिंदी संस्करण और ब्रेल लिपि में गाइड का भी विमोचन किया गया। इसके साथ ही ‘जस्टिस टू चिल्ड्रन लिटिगेशन फेलोशिप प्रोग्राम’ तथा मध्यस्थता पर सर्टिफिकेट कोर्स ‘विवाद से सहमति की ओर’ का शुभारंभ हुआ। केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल सहित अन्य अतिथियों ने ‘न्याय के स्वर’ पुस्तक का विमोचन किया।
पीड़ित की पीड़ा को उसकी भाषा में समझना जरूरी : सीजेआई
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्याय तक सभी की पहुंच केवल कानून के आधार पर सुनिश्चित नहीं की जा सकती, इसके लिए संवाद आवश्यक है। किसी विवाद में मध्यस्थता की प्रक्रिया सामने वाले को सुनने से शुरू होती है। न्याय मिलने से पहले पीड़ित को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी पीड़ा और समस्या को कोई सुन रहा है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की समस्या अलग हो सकती है और उसका समाधान भी एक जैसा नहीं हो सकता। स्थानीय समस्याओं को स्थानीय परिस्थितियों और सोच के अनुरूप समझकर समाधान तक ले जाना होगा। किसी पीड़ित के दुख-दर्द को उसकी अपनी भाषा में और अंतर्मन से समझना समस्या के सही निदान और अंतिम न्याय का आधार बन सकता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि गरीब, आर्थिक रूप से कमजोर, महिलाओं और बच्चों को विधिक सहायता देना कोई चैरिटी नहीं, बल्कि उनका संवैधानिक अधिकार है। समाज के अंतिम छोर तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना ही समानता का वास्तविक अर्थ है। उन्होंने पैरा लीगल वॉलेंटियर्स की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वे समाज के सबसे करीब हैं और वंचित तथा जरूरतमंद लोगों को उनके अधिकार और न्याय तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
न्याय व्यवस्था सहज, सुलभ और मानवीय हो : CM
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि न्याय पाना प्रत्येक व्यक्ति का प्राथमिक और मानवीय अधिकार है। न्याय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो सर्वव्यापी, सुलभ, सुगम, शीघ्र, सस्ती, समदर्शी और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण हो। उन्होंने मध्यस्थता को न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि छोटे-छोटे विवादों का संवाद और सहमति के माध्यम से समाधान होने से न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने बताया कि मध्यप्रदेश में पेपर लीक और धोखाधड़ी जैसे मामलों के तेजी से निराकरण के लिए चार फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में 24 घंटे के भीतर फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित किए गए। उन्होंने प्रदेश में ई-जीरो एफआईआर, साइबर सुरक्षा, राष्ट्रीय स्वचालित फिंगरप्रिंट पहचान प्रणाली और स्मार्ट पुलिसिंग जैसी तकनीकी पहलों का भी उल्लेख किया।
साइन लैंग्वेज और ब्रेल के जरिए न्याय की पहुंच बढ़ाने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि नालसा की शिक्षा स्कीम और साइन लैंग्वेज में थीम सॉन्ग न्याय की पहुंच को अधिक व्यापक बनाने में मदद करेंगे। हिंदी संस्करण और ब्रेल लिपि में गाइड दृष्टिबाधित लोगों के लिए विधिक सेवाओं को अधिक सुलभ बनाएगी। उन्होंने मध्यस्थता पर शुरू किए गए सर्टिफिकेट कोर्स को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि परिवार, पड़ोस और साझेदारी से जुड़े विवादों का संवाद के माध्यम से समाधान किया जा सकता है। मध्यस्थता में समाधान नागरिकों की सहमति से निकलता है, उन पर थोपा नहीं जाता।
न्याय को केवल अदालतों तक सीमित नहीं किया जा सकता : मेघवाल
केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय केवल न्यायालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक उसकी पहुंच सुनिश्चित करना सरकार की प्रतिबद्धता है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 39ए का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक और आर्थिक स्थिति किसी भी व्यक्ति को न्याय से वंचित नहीं कर सकती। तकनीक के इस्तेमाल से न्याय व्यवस्था को सरल और अधिक सुलभ बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में मध्यस्थता भारतीय न्याय व्यवस्था का प्रभावी स्तंभ बन सकती है।
न्याय तक समान पहुंच संवैधानिक जिम्मेदारी : हाईकोर्ट
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक रुसिया ने कहा कि ‘एक्सेस ऑफ जस्टिस’ केवल संवैधानिक सोच नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। समानता को चैरिटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
उन्होंने कहा कि तकनीकी नवाचारों के माध्यम से विधिक सेवाओं की पहुंच आसान हुई है। लोक अदालतों, कारागार सुधार, जनजातीय क्षेत्रों तक विधिक सेवाओं के विस्तार और प्रशिक्षित मध्यस्थों के माध्यम से न्यायालय पहुंचने से पहले ही अनेक मामलों के समाधान की दिशा में काम किया जा रहा है।
सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति विजय विश्नोई, न्यायमूर्ति आलोक आराधे, न्यायमूर्ति शील नागु, न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा, विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, विधिक सेवा प्राधिकरणों के वरिष्ठ पदाधिकारी, न्यायिक अधिकारी, इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव सहित बड़ी संख्या में पैरा लीगल वॉलेंटियर्स और अन्य गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
