वर्तमान राजनीति नेतागिरी पर व्यंग्य आलेख- डॉ पंकज वाधवानी (हाईकोर्ट एडवोकेट एवं विधि व्याख्याता)

थोबड़ा-शास्त्र: वर्तमान राजनीति का नया संस्करण

पुराने जमाने में राजनीति विचारधारा से चलती थी, अब विजुअल आइडेंटिटी से चलती है। चाणक्य की नीतियों का युग अब समाप्त हो चुका है, अब फोटोशूट, फोटोशॉप और फ्लेक्स प्रिंटिंग की क्रांतिकारी राजनीति का दौर है। किसी भी गाली सड़क से निकले अनचाहे थोबाड़ों को देखना अब लोकतंत्र की इस जनता की मजबूरी बन गया है। मूंछों वाले, बिना मूंछों वाले, गोरे, काले, उटपटांग, दंभ से भरे, नकली मुस्कान चेहरे पर लिए अलग-अलग थोबड़े जो आपको हर बात की बधाई और शुभकामनाएं देते नजर आएंगे।

जिसे कभी गली का निवासी तक नहीं पहचानता था, वो आज होर्डिंग के सेंटर में छपा बैठा है, और नीचे लिखा होता है — “आपका सेवक – अपने साथ समाज सेवक का डेजिग्नेशन लगाए हुए। अब कार्यकर्ता वो नहीं जो रात-दिन लोगों के बीच रहकर समस्या सुलझाए, बल्कि वो है जो नेताजी के पीछे फोटो में फ्रेम में आ जाए, चाहे आधा सिर ही दिखे।
वो जमाना लद गया जब नेता को जनता पहचानती थी, अब नेता खुद जनता को याद दिलाता है कि “मैं नेता हूं”, वो भी हर चौराहे पर अपने 8×10 फीट के थोबड़े से।

बैनरशास्त्र के प्रमुख सूत्र अब कुछ यूं हैं: चौराहा जितना बड़ा, उतनी बड़ी नेतागिरी, फोटो जितना हाई-रेजोल्यूशन, उतना ऊंचा राजनीतिक विज़न, रंग जितना तेज़, उतना तेज़ नेताजी का ‘इम्पैक्ट’। हर बर्थडे, हर श्रद्धांजलि, हर उद्घाटन, हर वार्ड में पाइप लाइन फूटी हो या बजट आया हो – नेताजी का चेहरा ज़रूर आएगा,और नहीं आए तो समर्थक नाराज़ हो जाते हैं, “हमारे नेता का थोबड़ा क्यों नहीं छपा?” यह वही कार्यकर्ता है जो घर में माता-पिता की बातों को नहीं मानते हैं और आज्ञा का अवहेलना करते हैं लेकिनअपने नेता के इर्द-गिर्द 24 घंटे सेवा में तत्पर लगे रहते हैं।

नेता बनने के लिए अब तीन चीजें जरूरी हैं: एक अच्छा कैमरा, एक ग्राफिक डिजाइनर,और एक प्रिंटिंग प्रेस वाला जो उधार में फ्लेक्स छाप दे। कई नवोदित नेता ऐसे हैं जिनके पास समस्या सुलझाने का हल नहीं, लेकिन फोटो खिंचवाने के सौ पोज़ हैं। वो जनता के पास नहीं जाते, बल्कि जनता से कहते हैं — “एक बार मेरी पोस्ट देख लो, सब समझ आ जाएगा।”
नेतागिरी का अब नया मापदंड यह है कि ‘चेहरा दिखा या नहीं?’

नेता जी के सोशल मीडिया पर 20-30 तस्वीरें होंगी जिसमें नेताजी एक हाथ जोड़ते हुए (कृत्रिम मुस्कान के साथ), एक माल्यार्पण करते हुए (जैसे गांधी जी या अंबेडकर जी को personally जानते हों), एक किसी बुज़ुर्ग को कंबल देते हुए (जैसे हर ठंड में उन्हीं से उम्मीद हो) और एक बच्चा गोद में उठाए हुए (भले ही बच्चा रो रहा हो, पर कैमरा स्माइल पकड़ेगा)।

राजनीति के महागुरु चाणक्य की राजनीति थी – “राज्य कैसे चलाना है?” आज के गुरु घंटालों की राजनीति है – “कैमरा किस एंगल से चलाना है?” चाणक्य अगर आज होते तो कदाचित विष्णुगुप्त नहीं, “विज्ञापनगुप्त” कहलाते। तक्षशिला की बजाय उन्हें इंस्टाग्राम और ट्विटर पर देखा जाता, जहाँ वे “Realpolitik” की जगह “Real Filters” से नीति बनाते, और दुख की बात ये है कि इस बैनर संस्कृति में असली नेता गुम हो गए हैं।वो जो सालों से लोगों के दुख-दर्द में साथ हैं, उन्हें कोई नहीं जानता। लेकिन जिस नए छोरे ने 10,000 में 6 बैनर छपवाए, वह अब “युवा जोश के प्रतीक” बन चुका है। सच कहें तो आज राजनीति में विचार मर रहे हैं, और चेहरे छप रहे हैं। जहाँ कभी “विनम्रता” नेता की पहचान होती थी, आज वहाँ “पोस्टर में साइज कितना बड़ा”यह पहचान रह गई है। आश्चर्य तो तब होता है कि वर्तमान मीडिया भी पोस्टर और बैनरों के आधार पर शहर, प्रदेश अथवा देश की राजनीति में नेताजी के कद का आकलन करते हुए दिखाई देते हैं।

— डॉ पंकज वाधवानी (हाईकोर्ट एडवोकेट)
(लेखक पूर्व में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में शासकीय अधिवक्ता रह चुके हैं)
मोबाइल क्रमांक-9827396423

By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।