मज़दूरों के अधिकारों पर गहरी चोट, ‘Ease of Doing Business’ के नाम पर ‘Hire and Fire’ को मिली वैधता

इंदौर। देशभर के सभी प्रमुख श्रमिक संगठनों ने केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए श्रम कानूनों (लेबर कोड्स) का कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। संगठनों का कहना है कि सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को मिलाकर भले ही 4 लेबर कोड बनाए हों, लेकिन इनका असली उद्देश्य “हायर एंड फायर” नीति को वैध बनाना और मज़दूरों की दशकों की संघर्ष से मिली सुरक्षा को कमजोर करना है।
इसे लेकर INTUC के संगठन मंत्री (मध्य प्रदेश) हरनाम सिंह धालीवाल ने कहा कि “सरकारी प्रचार के झूठ से बचें, सच जानें, सच पढ़ें… नए लेबर कोड मज़दूरों के अधिकारों पर सीधी चोट हैं।”


मुख्य आपत्तियाँ और आरोप

1. नौकरी की सुरक्षा खत्म

नए कोड नियोक्ताओं के पक्ष में बनाए गए हैं। इससे स्थायी रोजगार पर खतरा बढ़ेगा और मजदूरों की सुरक्षा लगभग समाप्त हो जाएगी।

2. यूनियनों की सौदेबाज़ी क्षमता कमजोर

सामूहिक सौदेबाज़ी की शक्ति घटने से बेहतर मजदूरी, सुरक्षा और सुविधा पर बातचीत करना मुश्किल होगा।

3. हड़ताल के अधिकार पर भारी प्रहार

शांतिपूर्ण हड़ताल तक को अपराध की श्रेणी में रख दिया गया है। इससे मजदूर संगठनों का लोकतांत्रिक अधिकार सीमित होगा।

4. फिक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट का विस्तार

अब कंपनियाँ कम अवधि के लिए मजदूर रख सकेंगी और अनुबंध पूरा होते ही उन्हें हटाया जा सकेगा। ठेका प्रथा को वैधता मिल गई है।

5. छंटनी में सरकार की अनुमति की सीमा 100 से बढ़ाकर 300

300 से कम कर्मचारियों वाले सभी संस्थान मनमाने ढंग से छंटनी कर सकेंगे।

6. असंगठित क्षेत्र लगभग पूरी तरह बाहर

भारत की 93% श्रमशक्ति लेबर कोड के दायरे से बाहर है—न सुरक्षा, न सामाजिक सुरक्षा।

7. ठेका मजदूरों का बढ़ता हिस्सा

ठेका प्रणाली बढ़ने से कम मजदूरी, कम सुविधाएँ और मालिक की जवाबदेही कम हो गई है।

8. PF–ग्रेच्युटी सुरक्षा कमजोर

PF और ग्रेच्युटी का दायरा घटा दिया गया है। नियोक्ता/ठेकेदार के जमा न करने पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।

9. कृषि, घरेलू व गिग वर्कर्स की अनदेखी

कुल कार्यबल का 50% रोजगार देने वाला कृषि क्षेत्र पूरी तरह कोड्स से बाहर है।
गिग और घरेलू कामगारों को भी कोई ठोस सुरक्षा नहीं मिली।

10. सुरक्षा समिति बनाने के लिए 250 कर्मचारियों की शर्त

हर साल हजारों औद्योगिक मौतों के बीच यह शर्त मज़दूरों की सुरक्षा के साथ मज़ाक बताई जा रही है।

11. लेबर कोर्ट खत्म—न्याय दूर हुआ

जिला स्तर के लेबर कोर्ट समाप्त होने से मजदूरों के लिए न्याय पाना और कठिन हो गया है।


धालीवाल ने कहा—‘मज़दूर विरोधी और संविधान विरोधी हैं ये कोड’

INTUC के नेता धालीवाल ने कहा कि नए लेबर कोड मजदूरों के अधिकारों को कमज़ोर करते हैं और संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं।
उन्होंने सभी श्रमिक संगठनों से एकजुट होकर इन कोड्स का विरोध करने की अपील की है।


मज़दूर संगठनों का आरोप है कि नए श्रम कानून मजदूरों का नहीं, बल्कि बड़े उद्योगों का हित साधते हैं। यह मज़दूरों के सामाजिक–आर्थिक सुरक्षा जाल को खत्म कर देंगे।
देशभर में विभिन्न श्रमिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इन कानूनों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन शुरू किया जाएगा।

By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।