नई दिल्ली/इंदौर, 13 फरवरी 2026: देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश के एक नाबालिग छात्र को बड़ी राहत देते हुए उसे 10वीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल होने की अनुमति प्रदान की है। युगल पीठ ने Council for the Indian School Certificate Examinations (CISCE) को छात्र को परीक्षा में बैठने देने के निर्देश दिए हैं।

    13 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna एवं न्यायमूर्ति Ujjayal Bhuyan की पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि वह लड़का “समाज में जो हो रहा है उसका एक लक्षण मात्र है, क्योंकि आज हर कोई एक-दूसरे को अपमानित कर रहा है। समाज से सीखी गई हरकतों के कारण बच्चे का शैक्षणिक वर्ष बर्बाद नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि छात्र नाबालिग है और उसके भविष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे पहले 6 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी किए थे।

    याचिकाकर्ता की दलील

    सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि 10वीं की बोर्ड परीक्षाएं CISCE द्वारा 17 फरवरी 2026 से आयोजित की जानी हैं। छात्र का पंजीकरण पहले ही संबंधित स्कूल के माध्यम से CISCE, नई दिल्ली में हो चुका है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता निपुन सक्सेना ने दलील दी कि यदि छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी गई तो उसका पूरा शैक्षणिक वर्ष नष्ट हो जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कूल ने सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय छात्र को निष्कासित करने जैसी कठोरतम कार्रवाई की, जो अनुचित है। कोर्ट को यह भी बताया गया कि छात्र फिलहाल घर पर निजी रूप से पढ़ाई कर रहा है।

    स्कूल की आपत्ति

    वहीं स्कूल की ओर से इस अनुमति का विरोध करते हुए कहा गया कि छात्र के कृत्य को माफ नहीं किया जा सकता और उसे परीक्षा में बैठने देने से स्कूल प्रशासन का मनोबल गिरेगा। स्कूल की ओर से अधिवक्ता अभय सिंह एवं तरंग चेलावत ने पक्ष रखा।

    कोर्ट का अंतरिम निर्देश

    न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने CISCE को निर्देश दिया कि छात्र को परीक्षा में शामिल होने हेतु एडमिट कार्ड/हॉल टिकट जारी किया जाए। साथ ही, संबंधित स्कूल को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वह छात्र की परीक्षा अन्य विद्यार्थियों से अलग कक्ष में आयोजित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, स्कूल को फिजिकल एजुकेशन एवं SUPW (Socially Useful Productive Work) का आंतरिक मूल्यांकन कर अंक CISCE को भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह आदेश विशेष अनुमति याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।

    क्या है मामला

    इंदौर के सुखलिया क्षेत्र स्थित एक निजी इंग्लिश मीडियम स्कूल ने बीते वर्ष 9वीं कक्षा के एक छात्र को इस आरोप में निष्कासित कर दिया था कि उसने अन्य छात्रों के साथ मिलकर कुछ शिक्षकों के मीम बनाकर सोशल मीडिया पर एक निजी पेज पर साझा किए। आरोप है कि बिना किसी विधिवत जांच के छात्र को एकपक्षीय रूप से स्कूल से बाहर कर दिया गया।

    मप्र बाल संरक्षण आयोग के आदेशों की स्कूल और इंदौर कलेक्टर द्वारा अवहेलना के बाद छात्र के पिता ने पहले Indore High Court का रुख किया, जहां से राहत न मिलने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह निर्णय छात्र के शैक्षणिक भविष्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

    By Neha Jain

    नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।