क्या शासन-प्रशासन की नाकामी भी भगवान पर डाली जाएगी?

क्या निलंबन, लाइन अटैच और मुआवजे से पूरी हो जाएगी जवाबदेही?

इंदौर, 16 सितम्बर। नशे में धुत ट्रक ड्राइवर ने सोमवार शाम शहर की सड़कों पर मौत का तांडव मचाया। पौने दो किलोमीटर तक बेकाबू दौड़े ट्रक ने राहगीरों को रौंद डाला। तीन लोगों की मौत हुई, कई घायल हुए। पूरा शहर सदमे और गुस्से में है। लेकिन इस त्रासदी के बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव का बयान—“बाबा (महाकाल) की लीला है”—जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा लगा।

सीएम आए, बोले और उलटे पैर लौट गए

महाकाल की नगरी उज्जैन गृह क्षेत्र से आने वाले इंदौर के प्रभारी मंत्री और मुख्यमंत्री मंगलवार दोपहर इंदौर पहुंचे। अस्पताल जाकर घायलों से मिले, फिर दोपहर 3 बजकर 11 मिनट पर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और यहाँ जनप्रतिनिधियों के साथ अधिकारियों से बैठक की और फिर पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रेस से मुखातिब हुए। लेकिन यह ‘प्रेस से चर्चा’ सभागृह की जगह कॉरीडोर में हुई। जो चर्चा के बजाय एकतरफा बयानबाजी निकली। मुख्यमंत्री ने फिर से ‘मन की बात की’ और जन की बात नहीं सुनी। महज 12 मिनट प्रेस नोट पढ़ा—5 मिनट हादसे पर और बाकी 17 सितंबर को धार में होने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम पर। पत्रकार सवाल पूछने लगे तो मुख्यमंत्री बिना जवाब दिये तुरंत चल दिये ।

“बाबा की लीला” कहना या जिम्मेदारी से बचना?

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मुख्यमंत्री ने इस भयावह हादसे को “बाबा की लीला” कह दिया।

सीएम यादव ने कहा,”कल बीती घटना से मेरा मन भी व्यथित है, हम सब इस दुख में भी शामिल हैं। बाबा की लीला है कोई ऐसा खराब समय था जिसके कारण ऐसी घटना घटी। मैं आश्वस्त करता हूँ मैंने अधिकारियों को ताकीद किया है कि किसी हालत में दोबारा ऐसी घटना न घटे।”

लेकिन जब मीडिया ने सवाल पूछा यह बाबा की लीला नहीं, भ्रष्टाचार की पोल खोल है, जिस पर सीएम यादव तुरंत कुर्सी छोड़ उल्टे पैर लौट गए । मीडिया सवाल ही पूछते रह गया और सीएम निकल गए।

सवाल यह है—

क्या सिस्टम की नाकामी को भगवान पर डालना संवेदनशील नेतृत्व है?

क्या प्रशासन की लापरवाही, पुलिस की विफलता और ट्रैफिक प्रबंधन की खामियों का जवाब ‘लीला’ बनकर दिया जाएगा?

जिन घरों के चिराग बुझ गए, उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ देना ही सरकार का कर्तव्य है?

जनसुनवाई बनी मज़ाक, मीडिया को कैद किया गया

कलेक्टर कार्यालय में सीएम की मौजूदगी के कारण मंगलवार की तय जनसुनवाई पंगु हो गई। अपनी समस्याएँ लेकर आए फरियादियों को वॉलेंटियर भगा रहे थे। चूंकि कलेक्टर शिवम यादव सीएम मूवमेंट व्यस्त थे, और सीएम भी कलेक्टर कार्यालय आ रहे थे, लिहाजा फरियादियों की पीड़ा को दरकिनार किया गया। साथ ही साथ मीडिया को भी ‘फ्री मूवमेंट’ से रोका गया और एक जगह रोकने की कोशिश हुई। सवाल है—आखिर सरकार किससे डर रही है? जनता से या सवालों से?

औपचारिक कार्रवाई या दिखावा?

सीएम ने घोषणा की कि संबंधित पुलिस उपायुक्त को लाइन अटैच किया जाएगा और जांच होगी। लेकिन क्या इतनी बड़ी त्रासदी के बाद सिर्फ लाइन अटैच करना, निलम्बन करना, मुआवजा देना ही न्याय है? क्या तीन जानों का मोल केवल कागजी जांच और औपचारिक बैठकों तक सीमित रह जाएगा?


कटु सवाल जनता के मन में:

जब नागरिक मरे, तब सरकार ने इसे “बाबा की लीला” क्यों कहा?

क्या मुख्यमंत्री जनता के सवालों से भाग रहे हैं?

क्या जवाबदेही से बचने के लिए जिम्मेदारी भगवान पर डालना नया राजनीतिक हथियार है?

क्या इंदौर की सड़कों पर कल फिर ऐसा ही मौत का ट्रक दौड़ेगा?


यह हादसा केवल तीन परिवारों का दुख नहीं है, यह सवाल पूरे सिस्टम पर है। और उस शहर से जहां भाजपा की ट्रिपल इंजन की सरकार है। 9 के 9 विधायक भाजपा के हैं । नगर निगम में भाजपा की सरकार है। सांसद भाजपा के हैं। 2 कबीना मंत्री इंदौर से हैं। इन जिम्मेदारों के शहर में और सिस्टम से बच निकलने का रास्ता “लीला” कहना नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना है।

By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।