इंदौर में हरित क्षेत्र बढ़ाने की ठोस कार्ययोजना जरूरी, विशेषज्ञों ने दिए व्यावहारिक सुझाव

इंदौर, 24 दिसंबर 2025: दिल्ली समेत उत्तर भारत में गहराते पर्यावरण संकट के बीच इंदौर के लिए भी यह एक आसन्न चेतावनी है। विकास आवश्यक है, लेकिन उसे सतत, समावेशी और पर्यावरण–सम्मत बनाना आज की अनिवार्यता बन चुका है। इसी विषय पर इंदौर की सामाजिक संस्था डेवेलपमेंट फाउंडेशन द्वारा अभय प्रशाल स्थित होल्कर ज्ञान मंडपम में “वर्तमान परिदृश्य में पर्यावरण की चुनौतियाँ” विषय पर विचार–विमर्श का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में पर्यावरण विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने इंदौर में हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए विस्तृत और वैज्ञानिक कार्ययोजना की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ताओं ने चिंता जताई कि अनियंत्रित शहरीकरण, बढ़ते वाहन और घटते हरित क्षेत्र आने वाले वर्षों में गंभीर संकट का कारण बन सकते हैं।

पीएचडी स्कॉलर डॉ. नेहा कोराने धामेचा ने अपने शोध के निष्कर्ष साझा करते हुए बताया कि उन्होंने बरगद, पीपल, आम और सप्तपर्णी जैसे वृक्षों के पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन किया है। शोध में सामने आया कि बरगद और पीपल जैसे पारंपरिक वृक्ष तापमान नियंत्रित करने में सबसे अधिक प्रभावी हैं। उन्होंने बताया कि इंदौर के कम हरित क्षेत्रों में विकसित हरित क्षेत्रों की तुलना में 6 से 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान पाया गया है।

मुख्य वक्ता पर्यावरणविद डॉ. ओ. पी. जोशी ने कहा कि इंदौर में केवल 9 प्रतिशत हरित क्षेत्र होना गंभीर शहरी संकट का संकेत है। उन्होंने बताया कि लगभग 30 लाख की 24आबादी वाले शहर में उतने ही वाहन प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। डॉ. जोशी ने शासन–प्रशासन से अपील की कि सड़कों और डिवाइडरों पर केवल सजावटी पौधों के बजाय परंपरागत, छायादार और जीवन मूल्यों को बढ़ाने वाले वृक्ष लगाए जाएँ।

पर्यावरणविद डॉ. किशोर पवार ने कहा कि इंदौर के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी पर्यावरण कार्ययोजना बनाने में विशेषज्ञों की सलाह को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। कार्यक्रम के अध्यक्ष सी. बी. सिंह ने कहा कि अब विकास योजनाओं का पर्यावरण–सम्मत होना विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

वरिष्ठ पत्रकार नेहा जैन ने पर्यावरण संकट को खाद्य सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि आज फल–सब्जियाँ खाने के बावजूद बड़ी आबादी विटामिन डी, बी–12 और अन्य पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही है। डॉक्टरों द्वारा मल्टीविटामिन दवाओं का बढ़ता प्रिस्क्रिप्शन इस स्थिति को दर्शाता है। उन्होंने मिट्टी में उपयोग हो रहे रासायनिक उर्वरकों पर नियंत्रण और सरकारी निगरानी की आवश्यकता बताई। साथ ही कहा कि नए पेड़ लगाने के साथ–साथ वर्षों पुराने पेड़ों को बचाना भी उतना ही जरूरी है, जिसके लिए चिपको आंदोलन जैसी जनभागीदारी की जरूरत है।

वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. राम गुलाम राज़दान ने कहा कि पर्यावरण और मानसिक स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। डिप्रेशन और एंग्जायटी से पीड़ित मरीजों को प्रकृति के बीच समय बिताने की सलाह दी जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि इंदौर सबसे स्वच्छ शहर होने के बावजूद विकास की अंधी दौड़ में उसे दिल्ली जैसा क्यों बनाया जा रहा है?

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी सुनील व्यास ने नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में बच्चे मैदानों और बाग–बगीचों से दूर होते जा रहे हैं, जिसमें अभिभावकों की भी अहम भूमिका है।

संस्था के प्रबंध न्यासी आलोक खरे ने बताया कि कार्यक्रम में प्राप्त सभी सुझावों को संकलित कर शासन–प्रशासन को भेजा जाएगा, ताकि नीति निर्माण में इन पर गंभीरता से विचार हो सके।

कार्यक्रम का संचालन श्याम पांडे ने किया तथा आभार प्रदर्शन रामेश्वर गुप्ता ने किया। प्रारंभ में मनोहर देव, किर्ति यादव, रंजना नाईक, प्रणिता दीक्षित, प्रो. असद खान, राजू सैनी, संदीप खानविलकर, डी. सी. पाटीदार, नरेश मुंदड़ा सहित अन्य अतिथियों ने स्वागत किया। इस अवसर पर फाउंडेशन की पत्रिका “वार्ता” का भी वितरण किया गया।

By Neha Jain

नेहा जैन मध्यप्रदेश की जानी-मानी पत्रकार है। समाचार एजेंसी यूएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय सेवाएं दी है। सुश्री जैन इंदौर से प्रकाशित एक दैनिक अखबार की संपादक रही है। इनकी कोविड-19 महामारी के दौरान की गई रिपोर्ट को देश और दुनिया ने सराहा। अपनी बेबाकी और तीखे सवालों के लिए वे विख्यात है।