एनईपी में पाठ्यक्रम डेवेलप होने में लग रहा समय, एआई से कर पाएगा मुक़ाबला: नेहा जैन
इंदौर। नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयों और बदलते शैक्षिक परिवेश की भाषा, व्यवहार एवं मनोवैज्ञानिक चुनौतियों विषय पर डेवेलपमेंट फाउंडेशन द्वारा विचार-विमर्श कार्यक्रम बुधवार को जाल सभा गृह में आयोजित किया गया।
इस अवसर पर शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में न्यूजO2 और इंदौर वार्ता की एडिटर नेहा जैन ने कहा कि NEP एक दूरदर्शी और स्वागत योग्य पहल है, लेकिन ज़मीन पर इसका क्रियान्वयन बेहद चुनौतीपूर्ण और कई मायनों में अव्यावहारिक है। सुश्री जैन ने आगे कहा:-
1. भाषा से जुड़ी चुनौतियां
मप्र पहला राज्य था जिसने NEP लागू करने की पहल की और मेडिकल शिक्षा हिंदी में शुरू करने का प्रयास किया। इसके लिए सरकार ने 10 करोड़ रुपये खर्च कर हिंदी में मेडिकल की किताबें प्रकाशित कीं। लेकिन हकीकत यह है कि एक भी मेडिकल छात्र ने MBBS की परीक्षा हिंदी में नहीं दी।
सही है कि मातृभाषा में शिक्षा से समझ बेहतर होती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर इंग्लिश का दबदबा है। गुणवत्तापूर्ण कंटेंट और रिसर्च इंग्लिश में ही उपलब्ध है। यहां तक कि हम कई विदेशी लेखकों की किताबों का अनुवाद कर छात्रों को पढ़ा रहे हैं। मेरी अपनी मेड भी अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा रही है, क्योंकि वह जानती है कि आज भी इंग्लिश ग्लोबल भाषा है।
2. टीचर्स ट्रेनिंग और संसाधन
NEP को लागू करने के लिए शिक्षकों का माइंडसेट बदलना सबसे कठिन कार्य है। अधिकतर शिक्षक टेक्नो-फ्रेंडली नहीं हैं और उन्हें नई शिक्षा प्रणाली को समझने व अपनाने के लिए गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
डिजिटल क्लास, लैब और आवश्यक संसाधन अभी भी सीमित हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी कमजोर है।
3. मल्टी-डिसिप्लिनरी कोर्स
NEP के तहत छात्रों को मेजर के साथ माइनर विषय लेने का विकल्प दिया गया है। जैसे – आर्ट्स के साथ साइंस या साइंस के साथ आर्ट्स। यह सोच नई और प्रगतिशील है, लेकिन इससे पारंपरिक विषयों की गहराई कम हो गई है। छात्र किसी भी एक विषय में दक्ष नहीं हो पा रहे हैं और भ्रमित हो रहे हैं कि उन्हें क्या पढ़ना चाहिए और क्या छोड़ना चाहिए।
4. समय, तकनीक और भविष्य की चुनौतियां
NEP 2020 के लागू होने के पांच साल बाद भी पाठ्यक्रम पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है। इसे जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू करते-करते 2030 और उच्च शिक्षा में पहुँचते 2035 हो जाएगा।
लेकिन तब तक परिदृश्य बदल चुका होगा। AI ने पहले ही कई रोजगार खत्म कर दिए हैं। अगले दो साल में 40 लाख और 2030 तक 2 करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं। भारत की 65% आबादी 25 वर्ष से कम है। अगर इतनी बड़ी युवा आबादी को रोजगार नहीं मिला तो संकट गहरा जाएगा।
IT सेक्टर, जो भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है, वह भी वैश्विक नीतियों और तकनीक के दबाव में है। आने वाले समय में तीन वर्ग बनेंगे – Employed, Unemployed और
Unemployable (ऐसे लोग जिनके कौशल अप्रासंगिक हो जाएंगे)। उदाहरण के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की वजह से टेली कॉलर, क्लर्क जैसी नौकरियाँ खत्म हो रही हैं। इसी तरह 10 सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर इंजीनियर के बराबर एक मशीन दक्षतापूर्वक काम कर सकती है, लिहाजा के पद भी संकट के दौर से गुजर रहे हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल है – क्या NEP भविष्य की इन चुनौतियों का समाधान कर पाएगी? या फिर AI के बढ़ते प्रभाव के सामने अप्रासंगिक हो जाएगी?
5. आवश्यक सुधार और समाधान
- शिक्षा में वैल्यू एजुकेशन अनिवार्य की जानी चाहिए।
- हर स्कूल में काउंसलर की नियुक्ति होनी चाहिए।
- पेरेंट्स, स्टूडेंट्स और स्कूल – तीनों के लिए साइबर अवेयरनेस ट्रेनिंग जरूरी है।
- पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग को औपचारिकता न मानकर मजबूत संवाद का मंच बनाया जाना चाहिए।
- टीचर्स, स्टूडेंट्स और पेरेंट्स – सभी को मिलकर नई चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा।
