रक्षाबंधन पर घर लौटने के बजाय नेपाल पहुंची अर्चना
इंदौर/भोपाल
10 दिन से लापता कटनी निवासी एडवोकेट अर्चना तिवारी का रहस्य आखिरकार सुलझ गया है। पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि रक्षाबंधन पर घर जाने के बजाय वे शुजालपुर निवासी सारांश जैन और उसके साथी तेजेंदर की मदद से नेपाल के काठमांडू पहुंच गई थीं। पुलिस ने अर्चना को काठमांडू से सुरक्षित बरामद कर लिया है। बुधवार को भोपाल पुलिस अर्चना को उसके परिजनों को सौंप देगी।
रेल एसपी राहुल लोढ़ा ने आज एक प्रेस वार्ता में बताया कि जानकारी के अनुसार, रक्षाबंधन पर 7 अगस्त को अर्चना तिवारी इंदौर से कटनी के लिए ट्रेन से रवाना हुई थीं। लेकिन रास्ते में वे इटारसी आउटर पर उतर गईं। वहीं से वे सारांश जैन के साथ शुजालपुर चली गईं और दो दिन तक शुजालपुर में ही रहीं। ट्रेन में उनके कपड़े बदलवाने में तेजेंदर ने मदद की थी। तेजेन्द्र पुराना क्लाइंट है। इस बीच जब मीडिया में मामला तूल पकड़ने लगा तो तीनों ने सोचा कि प्रदेश में रुकना मुश्किल होगा, लिहाजा पहले हैदराबाद और फिर नेपाल जाने की योजना बनाई। 14 अगस्त को अर्चना सारांश के साथ काठमांडू पहुंच गईं, जहां सारांश उन्हें छोड़कर वापस मध्यप्रदेश लौट आया।
पुलिस जांच में अर्चना की कॉल डिटेल से सारांश से लंबी बातचीत का पता चला। पूछताछ में सारांश ने सारी जानकारी कबूल कर ली। बताया गया कि सारांश का ड्रोन का स्टार्टअप है और उसके कुछ क्लाइंट काठमांडू में रहते हैं।
एसपी राहुल लोढ़ा ने आगे बताया बहुत प्लानिंग से अर्चना द्वारा खुद के गुमशुदा होने की साजिश रची गई। भागने का तीनों ने ऐसा प्लान बनाया कि किसी भी टोल नाके पर किसी भी सीसीटीवी में कैद न हो। ट्रेन में अर्चना ने सामान इसलिए छोड़ा और मोबाइल की सिम बंद की ताकि पुलिस को लगे कि वह ट्रेन से गिर गई है।
पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि अर्चना के परिजन हाल ही में उनका रिश्ता एक पटवारी से तय करने का दबाव बना रहे थे, जबकि अर्चना ने इस रिश्ते से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने यह कदम उठाया। पुलिस का कहना है कि चूंकि अर्चना खुद मिसिंग थीं और किसी अपराध में शामिल नहीं थीं, लिहाजा उन पर कोई केस दर्ज नहीं किया गया है। फिलहाल अर्चना के कथन लिए जाना शेष है जिसमें घटना का उद्देश्य पुलिस पता लगाने की कोशिश करेगी।
लेकिन अब खड़े होते हैं कई बड़े सवाल…
अर्चना कोई साधारण युवती नहीं हैं। वे एडवोकेट हैं और सिविल जज की तैयारी कर रही थीं। यानी कानून भलीभांति जानती हैं। बालिग होने के नाते अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकती थीं, फिर भी उन्होंने ऐसा रास्ता क्यों चुना जिससे परिवार और समाज को लगा कि वे गायब हो गई हैं?
क्या घर वालों का दबाव इतना था कि उन्होंने अपनी पहचान मिटाने की ठान ली?
क्या हमारे समाज में लड़कियों की इच्छा और करियर के सपनों को परिवार अब भी दरकिनार करता है?
क्या एक पढ़ी-लिखी युवती के लिए भी “शादी” ही जीवन का अंतिम विकल्प मान लिया जाता है?
क्या अर्चना ने सही वक्त पर परिवार से संवाद करने के बजाय भागने का रास्ता चुन लिया?
क्या यह कदम उनके करियर और सामाजिक छवि पर नकारात्मक असर डालेगा?
क्या इस मामले में सारांश और तेजेंदर सिर्फ सहयोगी थे या कहानी में और परतें छिपी हैं?
क्या पुलिस और समाज ऐसे मामलों में मानसिक काउंसलिंग का इंतज़ाम करते हैं या सिर्फ कानूनी प्रक्रिया तक सीमित रहते हैं?
